Poem 1ये जो लिखी है मैंने चार पंक्तियां ये आपही की मेहरबानी है,
मैने तो बस लिखे है इसके शब्द, पर ये आपके ही दिल से निकली कहानी है।
आप चाहते है हम साथ ही रहे, पर ये कमबख्त वक्त की किसी और पर मेहरबानी है।
यहां कोई किसी को साथ ले जाना चाहता है, पर यहां बंदिशों में हर एक की जिंदगानी है।
मैने तो बस लिखे है इसके शब्द, पर ये आपके ही दिल से निकली कहानी है।
Poem 2
ये जो लिखी हैं मैंने चार पंक्तियां, ये आप ही की मेहरबानी है,
मैंने तो बस लिखे हैं इसके शब्द, पर ये आपके ही दिल से निकली कहानी है।
आप चाहते हैं हम साथ ही रहें, पर ये कमबख्त वक्त किसी और पर मेहरबान है।
अभी भी हर लम्हा हमें साथ ले जाना चाहता है, पर बंदिशों में कैद हर एक की जिंदगानी है।
मैंने तो बस लिखे हैं इसके शब्द, पर ये आपके ही दिल से निकली कहानी है।
Poem 3
हम लिखेंगे आज वो अल्फ़ाज़ जो सदियों से दिलो में दबाये बैठे है।
मिटाएंगे आज वो सारे एहसास जो मुद्दतों से छुपाए बैठे है।
अपनी सादगी भरी एहसास हो जमाने से हंसते चेहरे के पीछे छुपाए बैठे है।
हमें उन्हें खाने का खौफ से अपने दिल के करीब और उनको दोस्ती का नाम बताए बैठे है।
पर चल ना सका ये नाजुक सा रिश्ता पल भर भी, क्योंकि वो दिल में किसी और को बसाए बैठे है।
हमें वो भी है मंजूर रहे वो सादगी भरे पल में उनके साथ, पर वो मेरे ख्याल मेरे पहचान को भी अपने यादों से निकाल बैठे है।
ये जो शब्दों और अल्फाजों को एक और में पिरोता हूं, उनकी यादों में ही हम शायर बने बैठे है।
Poem 4
कैसे करें बयां कि किस कदर मैंने अपना बचपना खोया था,
बचपन तो था, पर जिम्मेदारियों से फिर भी नहीं रोया था।
बिताया पूरा बचपना मैदानों में, लकड़ियों और मिट्टियों को समेटते हुए,
अच्छे वक़्त के सपने, अपने आंखों में बचपन में ही समेटते हुए।
फिर क्या धूप, क्या बारिश — बस जिम्मेदारियों को बचपन में ही पाया था,
ना थी उम्मीद किसी सहारे की, भट्ठे से ईंटें उठा कुछ खर्च लाया था।
कैसे करें बयां कि किस कदर मैंने अपना बचपना खोया था,
बचपन तो था, पर जिम्मेदारियों से फिर भी नहीं रोया था।
फिर जो हुआ बचपन से आज़ाद, तब सारे ख्वाबों को इक पल में खोया था,
बचपन में भी ना रोया, और जवानी में भी बाहर से ना रोया था।
पर इस ज़िंदगी की अजीब जिम्मेदारियों से, मन ही मन लहू के आंसू भी रोया था,
मिले जो कुछ यार इस ज़माने में, तो ज़िंदगी के हसीन ख्वाबों में भी सोया था।
ये कुछ पल का ही था ख्वाब, जिसे ज़िंदगी भर के लिए सोच कर सोया था।
कैसे करें बयां कि किस कदर मैंने अपना बचपना खोया था,
बचपन तो था, पर जिम्मेदारियों से फिर भी नहीं रोया था।
Poem 5
कुछ लफ्जों से बयां होती अगर दोस्ती इस जहां में।
तो करोड़ों कहानियां मिलती देखने को इस जहां में।
Poem 6
बचपन में कुछ ऐसे कच्चे सपने हमने पाले हैं।
जिन्दगी के हसीन पल बस जवानी को सोचकर गुजारे हैं।
हमें क्या खबर थी, हमें ये पल दुबारा नसीब नहीं होगा।
हमें ये वक्त देखकर दिल में शदीद दर्द भी होगा।
अब तो मुश्किलों को भी हमने ही शौक से पाले है।
जिन्दगी को खुशी से दूर, और पूरा ग़म में डूबा डाले है।
बचपन में कुछ ऐसे कच्चे सपने हमने पाले हैं।
Poem 7
यूं तो खुशियां हजार हो पर ग़म सा वफादार नहीं होती
यहाँ कोई भी हर शख्स की जिंदगी बिना ग़म के पार नहीं होती
आती है जब ये अपने उरूज पर साहिब
गैरो से तो बहुत दूर की बात है फिर अपनो से भी दिल की बात नहीं होती।
Poem 8
एक वक्त था जब उन्हें हम कुछ यूं याद करते थे।
हर वक्त ही नहीं सांसों के हर लम्हे में यार करते थे।
जमाना बितता गया इस खयालात में
Poem 9
हम हालात-ए-जि़ंदगी से बता, शिकवा क्या ही करें?
हम रोज़ की मुश्किलों से डर के, बता क्या ही करें?
जब जीना है हमें ज़िंदगी इन्हीं मुश्किलों के बीच,
फिर शिकायत कर के अपनों को रुसवा क्या ही करें?
Poem 10
बहुत नाज था हमें अपने दोस्ती पर
खुद से ज्यादा ऐतबार था अपने दोस्ती पर
पर यहाँ कौन मुद्दतों रुकता है
अब यहाँ अपनो के लिए झुकता है
Poem 11
यूँ तो हमें बहुत नाज है अपनी दोस्ती पर
खुद से भी ज्यादा ऐतबार है अपनी दोस्ती पर
यहाँ कौन मुद्दतों रुकता है इक दोस्ती पर
हजारों मिलते है पर कौन लिखता है एक दोस्ती पर
वो रुका मेरे भ्रम को तोड़कर मेरी दोस्ती पर
लोग रुकते नहीं पर वो रुका एक दोस्ती पर
शायद कुछ दुआएं मेरे हक में भी काम आ गई।
वरना उसको ना होता ऐतबार मेरी इस दोस्ती पर।
बस उठाया कलम और लिख दिया ऐतबार दोस्ती पर।
Poem 12
यूँ तो हमें बहुत नाज़ है अपनी दोस्ती पर,
ख़ुद से भी ज़्यादा ऐतबार है अपनी दोस्ती पर।
यहाँ कौन मुद्दतों रुकता है एक दोस्ती पर,
हज़ारों मिलते हैं, पर कौन लिखता है एक दोस्ती पर?
वो रुका, मेरे भ्रम को तोड़कर, मेरी इक दोस्ती पर।
लोग रुकते नहीं, पर वो रुका मेरी एक दोस्ती पर।
शायद कुछ दुआएँ मेरे हक़ में भी काम आ गईं,
वरना उसको न होता ऐतबार मेरी इस दोस्ती पर।
बस उठाया क़लम, और लिख दिया — "ऐतबार दोस्ती पर।"
Poem 13
हमने जो सुनाया जो उन्हें अपने हाल ए दिल की दास्तां
वो मुस्कुराए और सारे वाकिया को नजर अंदाज किया
हमने जो सुनाया था उन्हें अपना खैरखाह जानकार
उनके अंदाज ने जो किया नजरों
Poem 14
चला था वक़्त से बैर रखकर,
ज़माने का तमाशा देखा जाए।
खुद को अज़ीज़ जानकर,
अब गैरो का ही पासा देखा जाए।
न थी खबर कि वक़्त सब याद रखता है।
जब वक़्त ने लगाया तमाचा जीवन पर,
जमाने ने ही कहा — आओ,
अब इसका तमाशा देखा जाए।
Poem 15
चला था वक़्त से बैर रखकर,
ज़माने का तमाशा देखा जाए।
खुद को अज़ीज़ जानकर,
अब गैरो का पासा देखा जाए।
न थी खबर कि वक़्त सब याद रखता है।
जब वक़्त ने लगाया तमाचा जीवन पर,
जमाने ने ही कहा — आओ,
अब इसका तमाशा देखा जाए।
Poem 16
लिखें जो अल्फ़ाज़ खुद के वजूद को हमने
न पाया खुद सा बेवफा जमाने के वजूद में हमने।
लोग कहते रहे यहाँ सब अकेले ही जाते है।
न मानकर उनकी बातें तोड़ा खुद के वजूद को हमने।
Poem 17
लिखेंगे जो अल्फ़ाज़ खुद के वजूद की,
ज़माने में नाकाम इंसान कहलाएंगे।
जो समझे यहाँ सभी को अपना,
तो इसी ज़माने में रुसवा किए जाएंगे।
यहाँ सब अपने हैं, कोई नहीं बेगाना है —
यहाँ सब यही जताएंगे।
मालूम यहाँ तब चलेगा, जब हम अपनों के ही सामने ग़ैरों से ज़्यादा ज़लील किए जाएंगे।
लिखेंगे जो अल्फ़ाज़ खुद के वजूद की,
ज़माने में नाकाम इंसान कहलाएंगे।
फिर नाकामी की इस मुहर को,
जीवन की आख़िरी कोशिश से मिटाएंगे।
ना रहे सफ़र में अंत तक कोई अपना,
फिर भी अकेले ज़िंदगी की मुश्किलों को हँस कर आज़माएंगे।
ना रही ज़िंदगी तो कोई बात नहीं,
रहेंगे अगर ज़िंदा तो कामयाबी की आख़िरी पायदान तक जाएंगे।
फिर लिखेंगे खुद के अल्फ़ाज़ —
और लोगों के दिलों को छू कर ही आख़िरी सफ़र पर जाएंगे।
Poem 18
मिलेंगे कभी जो हम तुमसे तो यूँ कुछ अपनी दास्तां सुनाएंगे,
अपना ना कहके भी तुम्हे अपनी सारी दास्तां सुनाएंगे।
जो बीत गए सारा लम्हा, बुरा ही सही,
पर जब मिलूंगा तुमसे तो उन लम्हों को भी हसीन बताएंगे ।
बताएंगे उन यादों को भी जो तेरे साथ न बीत सके,
बिताना था एक छोटा सा जिन्दगी का लम्हा तेरे साथ ये भी बताएंगे।
मिलेंगे कभी जो हम तुमसे तो यूँ कुछ अपनी दास्तां सुनाएंगे,
फिर अपना कहके तुम्हे अपनी ये सारी दास्तां सुनाएंगे
Poem 19
वो पल ही बचपन के थे जब धुल में खिल जाते थे,
पापा के फटकार से कोने में छुप जाते थे,
मम्मी के दुलार से नखरे खूब दिखते थे,
स्कूलों से आने पर बस्ता ऐसे ही फेक जाते थे,
सुबह से लेकर शाम तक खेलने के बस जाते थे,
वो पल ही बचपन के थे जब धुल में खिल जाते थे,
गया बचपना गए शौख सब,
गई जीवन खुशहाली सब।
आया जीवन में एक दौर है ऐसा जिसे सवारा था बचपन में,
पाकर उस दौर जाना, कोई कराह नहीं था बचपन में।
युवा में शक्ति, युवा में ताकत जो पढ़ा था मैंने बचपन में,
अब जाकर मैने है जाना सब भ्रम था बचपन में।
मिला था बचपन में जितने सुख सब,
अब बची
Poem 20
मेरे हाथों ने लिख दिए ये जो दास्ताने दोस्ती अजीज की,
जैसी भी अतरंगी थी पर दोस्ती बड़ी अजीज थी,
बिन मतलब ही बात करता थे पर अजीज थी।
न कोई काम था न बहाना था फिर भी दोस्ती अजीज थी।
सच में फिर भी तू दोस्त अजीज थी।
बस समेटता हूँ लफ्जों को फिर भी तू दोस्त हूं ।
जैसी भी अतरंगी थी पर दोस्ती बड़ी अजीज थी,
मेरे हाथों ने लिख दिए ये जो दास्ताने दोस्ती अजीज की,
Poem 21
ना समझ सी ये जिन्दगी, अधूरा सा ये आशियाना था।
हुआ जो जिन्दगी का आगाज बस यही फसाना था।
कट जाएगी ये जिदंगी हसी खुशी में यूं ही इक मन में बहाना था।
मिली जवानी जिंदगी में तो सबकुछ काबू में कर जाना था।
मिला हकीकत के आईने उस आईने से तब जाना मिट जाना था।
ना समझ सी ये जिन्दगी, अधूरा सा ये आशियाना था।
मुक्तसर भरी ये जिन्दगी, बेखौफ सा ये जमाना था।
हम खुद को समझाते रहे यहाँ कोई नहीं बेगाना था
ये गुमान भी तब टूटा जब चार लोगों के कंधे पर कब्रिस्तान तलक जाना था।
फिर भूल गए वो रिश्ते टूटे गए सब नाता था।
फिर समझा यही जिन्दगी थी, यही वो आखिरी आशियाना था।
Poem 22
हो ना नाराज ऐ जिंदगी तू अभी कुछ यूं अदा दिखाएगी
देकर खुशियां एक छोटी सी बड़ी से जिदंगी से जोड़ जाएगी ।
जब मिलेगी जिदंगी के सच्चाई से तो तू ही कुछ यूं रूठ जाएगी
फिर वही एक छोटी सी खुशी ख्वाब बना जाएगी।
हो ना नाराज ऐ जिंदगी तू अभी कुछ यूं अदा दिखाएगी
ना खुशी के एहसास देगी ना ग़म से दूर लेकर जाएगी
एक छोटी सी खुशी के बाद पहाड़ सा ग़म छोड़ जाएगी।
हो ना नाराज ऐ जिंदगी तू अभी कुछ यूं अदा दिखाएगी
दिखाएगी तू कुछ यूं नज़ारा मुझे मेरे ही जीवन का
Poem 23
हो ना नाराज ऐ जिंदगी, तू अभी कुछ यूं अदा दिखाएगी।
देकर खुशियां एक छोटी सी, बड़ी से जिदंगी से जोड़ जाएगी।
जब मिलेगी जिदंगी के सच्चाई से, तो तू ही कुछ यूं रूठ जाएगी।
फिर वही एक छोटी सी खुशी ख्वाब बना जाएगी।
हो ना नाराज ऐ जिंदगी, तू अभी कुछ यूं अदा दिखाएगी।
ना खुशी के एहसास देगी, ना ग़म से दूर लेकर जाएगी।
एक छोटी सी खुशी के बाद पहाड़ सा ग़म छोड़ जाएगी।
हो ना नाराज ऐ जिंदगी, तू अभी कुछ यूं अदा दिखाएगी।
दिखाएगी तू कुछ यूं नज़ारा, मुझे मेरे ही जीवन का।
दिखाएगी ख्वाब जिसे सोचकर मन ही मन मैं मुस्कुराउँगा।
पर उन्हें पूरा करने के लिए, अपने जीवन को झोंक जाऊंगा।
तू देगी बेशक कुछ खुशियां, मेरे इस भगदड़ भरे मुकद्दर में।
छीनकर कर फूल सा बचपन, आफत भरी जिंदगी से जोड़ जाएगी।
हो ना नाराज ऐ जिंदगी, तू अभी कुछ यूं अदा दिखाएगी।
फिर एक छोटी सी खुशी के बाद, पहाड़ सा ग़म छोड़ जाएगी।
Poem 24
उनकी अजीज सी दास्तां-ए-दोस्ती कैसे सुनाऊं उन्हें।
उनकी आहट से प्यार कितना है, कैसे सुनाऊं उन्हें।
उनकी मुस्कुराहट से है कितना प्यार, कैसे बताऊं उन्हें।
अपना ना कह सकता हूँ, कैसे जताऊं उन्हें।
दोस्त हैं, मोहब्बत नहीं; जो इतनी कश्मकश में डालूं उन्हें।
हाँ, वो दोस्त हैं, पर जान से अजीज भी तो हैं!
ये सब बता कर, कैसे रुलाऊँ उन्हें।
है उनको कोई और अजीज, इस नायाब सी दुनिया में,
तो क्या, इस शिकवे को उनको बता, कैसे रुलाऊँ उन्हें।
मेरा क्या है? मैं तो मुस्कुराता हूँ, उन्हें हँसता देखकर।
क्या इतना भी हक़ नहीं कि देखकर मुस्कुराऊँ उन्हें।
वो हँसते रहें, यूँ ही अपने हसीन से ख़्वाबों में,
जब भी मिलूं, हँसते हुए पाऊँ उन्हें।"
"माना, यहाँ दोस्ती सदियों तक नहीं चलती।
यहाँ तेरे जैसे दोस्त सदियों में बहुत कम ही खिलती।
बताओ इस मतलबी से दौर में, उन्हें कैसे मैं अकेला छोड़ जाऊं?
यहाँ हर कदम पर ज़ालिम, उनसे कैसे मैं मुँह मोड़ जाऊं?
यूँ तो हैं वो इस ज़माने में सबसे अज़ीज़,
बताओ, फिर कैसे यहाँ तन्हा मैं उन्हें छोड़ जाऊं?"
"ना दे तवज्जु वो मुझ अदना को, अपने उस हसीन से कल में,
पर हम तो करेंगे दुआ, वो रहे मुस्कुराहट भरे पल में।
कुछ इस तरह, अजीज सी दास्तां-ए-दोस्ती सुनाऊं उन्हें।
उनकी हर सांस से पर ऐतबार है, बताऊं उन्हें।"
Poem 25
वो इक दोस्त है, मोहब्बत नहीं कि उन्हें हम अपने अल्फ़ाज़ों से क़ैद करें।
ना चाहिए हमें कुछ, बस ख़ुदा उनको सारे गेमों से बेऐब करे।
चाहते तो हैं उन्हें रखे हम सँभाल कर ताउम्र अपने पास।
बनाए ज़िंदगी का हर इक लम्हा हसीन ताउम्र उनके साथ।
पर वो इक दोस्त है, मोहब्बत नहीं कि उन्हें हम अपने अल्फ़ाज़ों से क़ैद करें।
ना चाहिए हमें कुछ, बस ख़ुदा उनको सारे गेमों से बेऐब करे।
Poem 26
ये अतरंगी सी दास्तां-ए-दोस्ती कैसे सुनाऊं मैं?
तेरी मुस्कुराहट से है कितना प्यार, कैसे बताऊं मैं?
अपना भी तो कह सकता नहीं, कैसे जताऊं मैं?
मेरा क्या है? मुस्कुराता हूँ मैं तुम्हें हँसता देख।
अब इतना भी हक़ नहीं, तुम्हें मुस्कुराता देख मुस्कुराऊं मैं।
यूँ ही हँसते रहो तुम ताउम्र इस हसीन सी दुनिया में,
जब भी, जहाँ भी मिलूं तुमसे, हँसते हुए ही हर वक्त पाऊँ मैं।
माना, ये दुनिया है, यहाँ दोस्ती सदियों तक नहीं मिलती।
यहाँ मेरे-तेरे जैसी दोस्ती सदियों में बहुत कम ही खिलती।
बता फिर इस मतलबी से दौर में, तुमको कैसे अकेला छोड़ जाऊं मैं?
यहाँ हर कदम पर ज़ालिम, तुमसे कैसे मुँह मोड़ जाऊं मैं?
ये अतरंगी सी दास्तां-ए-दोस्ती कैसे सुनाऊं मैं?
तेरी मुस्कुराहट से है कितना प्यार, कैसे बताऊं मैं?
Poem 27
जालिम से भरे इस दुनिया के हम कुछ यूँ अपना किरदार छोड़ जाएंगे।
पूरी जिन्दगी तो नहीं, पर अपनी एक छोटी सी मुस्कान छोड़ जाएंगे।
जमाना चाह कर भी भुला न पाएगा हमारे इस किरदार को।
जालिम सी इस दुनिया में, एक अलग ही पहचान छोड़ जाएंगे।
जाएंगे जब छोड़ कर इस मतलब भरी दुनिया को।
बताएंगे इसकी बेजान सी हकीकत, इस मतलबी दुनिया को।
मुकद्दर इतना हसीन तो ना था कि रखते हर एक को पलकों पर।
पर जिनको भी रखा इन पलकों पर, उन्हें हम कुछ यूँ याद आएंगे।
सोच कर बीते पल को, वो हर पल मुस्कुराएंगे, उन्हें हम कुछ यूँ याद आएंगे।
पूरी जिन्दगी तो नहीं, पर अपनी एक छोटी सी मुस्कान छोड़ जाएंगे।
जालिम से भरे इस दुनिया के हम कुछ यूँ अपनी पहचान छोड़ जाएंगे।
Poem 28
कैसे करें बयां कि किस कदर मैंने अपना बचपना खोया था,
बचपन तो था, पर जिम्मेदारियों से फिर भी नहीं रोया था।
बिताया पूरा बचपना मैदानों में, लकड़ियों और मिट्टियों को समेटते हुए,
अच्छे वक़्त के सपने, अपने आंखों में बचपन में ही समेटते हुए।
फिर क्या धूप, क्या बारिश — बस जिम्मेदारियों को बचपन में ही पाया था,
ना थी उम्मीद किसी सहारे की, भट्ठे से ईंटें उठा कुछ खर्च लाया था।
कैसे करें बयां कि किस कदर मैंने अपना बचपना खोया था,
बचपन तो था, पर जिम्मेदारियों से फिर भी नहीं रोया था।
फिर जो हुआ बचपन से आज़ाद, तब सारे ख्वाबों को इक पल में खोया था,
बचपन में भी ना रोया, और जवानी में भी बाहर से ना रोया था।
पर इस ज़िंदगी की अजीब जिम्मेदारियों से, मन ही मन लहू के आंसू भी रोया था,
मिले जो कुछ यार इस ज़माने में, तो ज़िंदगी के हसीन ख्वाबों में भी सोया था।
ये कुछ पल का ही था ख्वाब, जिसे ज़िंदगी भर के लिए सोच कर सोया था।
कैसे करें बयां कि किस कदर मैंने अपना बचपना खोया था,
बचपन तो था, पर जिम्मेदारियों से फिर भी नहीं रोया था।
Poem 29
आ, चल मुस्कुराते हैं जब तक मौत से मुलाक़ात न हो।
बसाएँ अपने ख्वाबों का आशियाना, जब तक आख़िरी साँस से मुलाक़ात न हो।
यहाँ कौन आया है रहने क़यामत तक?
चल, भूल कर ग़म, लोगों को हँसाते हैं जब तक ये ज़िन्दगी इस दुनिया से बर्ख़ास्त न हो।
Poem 30
ऐ शहर-ए फ़लस्तीन! क्या कहूँ मैं इस जहाँ को?
यहाँ तेरे ही तेरे वफ़ादार नहीं।
दुनियावी शोहरत की ख़ातिर तेरी क़ौम के ग़द्दार हैं यही।
यहाँ काफ़िर फिर भी बोलते हैं तेरे लहू को देखकर,
पर रब से वादा करने वाले ही दौलत के ग़ुलाम हैं — हुक्मरान यही।
Poem 31
वक़्त जो मिला तो मौत को कुछ यूँ याद करूँगा।
ज़िंदगी से दूर, एक ज़िंदगी की फ़रियाद करूँगा।
यहाँ जीने नहीं देती है सुकून से ये दुनिया,
मरने के बाद फिर ज़िंदगी के लम्हे इत्मीनान से लिखूंगा।
यहाँ इतने ग़म हैं जो ज़िंदगी में,
मरने के बाद क्या ख़ाक इंसान को पूछूँगा।
वक़्त जो मिला तो मौत को कुछ यूँ याद करूँगा।
Poem 32
चला था वक़्त से बैर रखकर, ज़माने का तमाशा देखा जाए।
खुद को अज़ीज़ जानकर, अपनों का ही पासा देखा जाए।
न थी खबर कि वक़्त सब याद करके रखता है।
जब वक़्त ने लगाया तमाचा जीवन पर,
अपनों ने ही कहा — आओ, अब इसका तमाशा देखा जाए।
Poem 33
ना है जिंदगी से कोई उम्मीद
ना मौत से खौफ है बाकी
यहाँ हम ही नहीं मरेंगे अकेले
हमने देखा है यहाँ मैय्यत रोज आती जाती।
माना ये हसीन दुनियां है साहिब
पर यहां कब किसने देखी है मौत आती।
Poem 34
ना है ज़िंदगी से कोई उम्मीद,
ना मौत से ख़ौफ़ है बाकी।
यहाँ हम ही नहीं मरेंगे अकेले,
हमने देखा है यहाँ मय्यत रोज़ आती-जाती।
माना ये हसीन दुनिया है साहब,
पर यहाँ कब किसने देखी है मौत आती?
Poem 35
जो कहे वो हमें गुनाहगार
तो हंस कर मान जाऊंगा।
गलती ना हो फिर भी मैं
तेरी बातों पर ऐतबार कर जाऊंगा।
उन्हें लगता होगा कि
वो आम सी शख्शियत है मेरी जिंदगी में
उन्हें मालूम नहीं है ये
मिले अगर मौत उनके जिंदगी के एवज में
तो हंस कर अपने मौत के बदले
उनके लिए जीवन खरीद जाऊंगा।
Poem 36
कहो जो तुम हमें गुनहगार,
तो हँस कर मान जाऊँगा।
गलती न हो फिर भी मैं,
तेरी बात पर ऐतबार कर जाऊँगा।
तुम्हें लगता होगा कि
तुम आम-सी शख्सियत हो मेरी ज़िंदगी में।
तुम्हें मालूम नहीं है ये,
मिले अगर मौत तेरी ज़िंदगी के एवज़ में,
तो हँस कर अपनी मौत के बदले,
तेरे लिए जीवन ख़रीद जाऊँगा।
Poem 37
मुद्दतों से सजाए थे जो हौसले इक पल में तोड़ दिए हमने
अपने से ही अपनी कहानी को इस कदर मोड़ दिए हमने
सब देख कर कहते है इस सा खुश मिजाज कोई नहीं।
Poem 38
कितने बेवकूफ और बड़बख्त हैं ये ज़माने वाले!
आए हैं उस माँ के लिए, बस एक दिन ख़ुशियाँ मनाने वाले।
ज़माना चाहकर भी इनका हक़ अदा नहीं कर सकता,
आए हैं उसके दूध का क़र्ज़ एक दिन में निभाने वाले।
कितने बेवकूफ और बड़बख्त हैं ये ज़माने वाले!
Poem 39
तू मेरा दोस्त है तू चाहत है मैं तुझे गलत कहूं
तू क्या चाहता है मैं खुद को गलत कहूं
अपने उम्र के तजुर्बे से परख बनाया है तुझे दोस्त
तू क्या चाहता है मैं अपने पूरे उम्र को गलत कहूं
माना
Poem 40
तू मेरा दोस्त है, तू चाहत है — मैं तुझे ग़लत कहूँ?
तू क्या चाहता है — मैं ख़ुद को ग़लत कहूँ?
अपनी उम्र के तजुर्बे से परखकर बनाया है तुझे दोस्त,
तू क्या चाहता है — मैं अपनी पूरी उम्र को ग़लत कहूँ?
माना, जीवन के हालात में कुछ यूँ मजबूर हूँ,
मैं न चाहकर भी अपने यार से दूर हूँ।
मैं चाहता हूँ — तुझसे अपनी शिकायत कहूँ,
फिर देख कर तेरे हालात, सोचता हूँ — बस मैं ऐसे ही चुप रहूँ।
तू मेरा दोस्त है, तू चाहत है — मैं तुझे ग़लत कहूँ?
तू क्या चाहता है — मैं ख़ुद को ग़लत कहूँ?
Poem 41
तू मेरा दोस्त है, तू चाहता है — मैं तुझे ग़लत कहूँ?
तू क्या चाहता है — मैं ख़ुद को ग़लत कहूँ?
अपनी उम्र के तजुर्बे से परखकर बनाया है तुझे दोस्त,
तू क्या चाहता है — मैं अपनी पूरी उम्र को ग़लत कहूँ?
माना, जीवन के हालात में कुछ यूँ मजबूर हूँ,
मैं न चाहकर भी अपने यार से दूर हूँ।
मैं चाहता हूँ — तुझसे अपनी शिकायत कहूँ,
फिर देख कर तेरे हालात, सोचता हूँ — बस मैं ऐसे ही चुप रहूँ।
तू मेरा दोस्त है, तू चाहता है — मैं तुझे ग़लत कहूँ?
तू क्या चाहता है — मैं ख़ुद को ग़लत कहूँ?
Poem 42
तू मेरा दोस्त है, तू चाहता है — मैं तुझे ग़लत कहूँ?
तू क्या चाहता है — मैं ख़ुद को ग़लत कहूँ?
अपनी उम्र के तजुर्बे से परखकर बनाया है तुझे दोस्त,
तू क्या चाहता है — मैं अपनी पूरी उम्र को ग़लत कहूँ?
माना, जीवन के हालात में कुछ यूँ मजबूर हूँ,
न चाहकर भी मैं तुझसे दूर हूँ।
मैं चाहता हूँ — तुझसे ही अपनी शिकायत कहूँ,
फिर देख कर तेरे हालात, सोचता हूँ — बस मैं ऐसे ही चुप रहूँ।
तू मेरा दोस्त है, तू चाहता है — मैं तुझे ग़लत कहूँ?
तू क्या चाहता है — मैं ख़ुद को ग़लत कहूँ?
Poem 43
जो लगे बेरुखी सी दोस्ती में तुम्हारे
तो बस इतनी सी बात को याद रखना
आए होंगे बदलाव जीवन में तुम्हारे
बस इतनी सी अपनी कमी को याद रखना
जमाने को मतलब नहीं लम्हों से तुम्हारे
रखना है तुम्हे संभाल कर खुद को
बस इतनी सी बात को याद रखना
दोस्त भी जीवन का हिस्सा है तुम्हारे
Poem 44
जो लगे बेरुखी सी दोस्ती में तुम्हारे
तो बस इतनी सी बात याद रखना।
आए होंगे बदलाव तुम्हारे भी जीवन में तुम्हारे
बस इतनी सी अपनी कमी याद रखना
दोस्त भी मुख्लिश होगा तुम्हारा
जमाने को मतलब नहीं लम्हों से तुम्हारे
रखना है तुम्हे संभाल कर खुद को
बस इतनी सी बात को याद रखना
दोस्त भी जीवन का हिस्सा है तुम्हारे
Poem 45
वक्त को देखकर खुद को कुछ ऐसे निखारा है हमने
जिंदगी मौत के साए में कुछ ऐसे गुजारा है हमने
लोग कहते हों हमारे बारे में कुछ भी कोई ग़म नहीं।
क्योंकि इन्हीं लोगों से सिख कर खुदगर्ज खुद को बनाया है हमने।
Poem 46
वक्त को देखकर खुद को कुछ ऐसे निखारा है हमने,
ज़िंदगी मौत के साए में कुछ ऐसे गुज़ारा है हमने।
लोग कहते हों हमारे बारे में कुछ भी, कोई ग़म नहीं,
क्योंकि इन्हीं लोगों से सीख कर ख़ुदगर्ज़ ख़ुद को बनाया है हमने।
Poem 47
फकत इतनी सी बात ही हमने माना है।
दोस्ती को एक अजीज रिश्ता ही हमने जाना है।
अजीब रिश्ता है ये दोस्ती का साहिब
खुद के ग़म को छोड़ कर उसको हंसाना है।
Poem 48
छोड़ दे ये सोचना कि हम बेकार बैठे हैं।
ना पाल ये भ्रम कि हम सब कुछ हार बैठे हैं।
माना, लहजे में थोड़ी मिठास है, ऐ आरिफ,
फिर भी ज़िंदगी के हर एक पहलू को ललकार बैठे हैं।
Poem 49
जो मिला मौका जीने का बचपना फिर से
तो फिर हम उसे कुछ ऐसे जिएंगे
ना रखेंगे बैर किसी से और हर किसी के साथ खुशी का जाम पियेंगे
माना जिंदगी ने कट रही है अफरा तफरी में तो क्या हुआ
मिला जो मौका जीने का बचपना इस दौर में
तो हर किसी के साथ हर कर जिएंगे
जिंदगी ने दिए है जितने ग़म अब तक जीवन में
हर एक ग़म के हिसाब से जीवन में सौ खुशी के साथ जिएंगे।
जो मिला मौका जीने का बचपना फिर से
तो फिर हम उसे कुछ ऐसे जिएंगे
Poem 50
जो मिला मौका जीने का बचपना फिर से
तो फिर हम उसे कुछ ऐसे जिएंगे
ना रखेंगे किसी से बैर
और हर किसी के साथ खुशी का जाम पियेंगे
माना जिंदगी कट रही है अफरा तफरी में तो क्या
मिला जो मौका जीने का बचपना इस दौर में
तो हर किसी के साथ हंस कर जिएंगे
दिए है जीवन में जितने ग़म अब तक जिंदगी ने
एक एक ग़म के हिसाब से जीवन को सौ सौ खुशियों के साथ जिएंगे।
जो मिला मौका जीने का बचपना फिर से
तो फिर हम उसे कुछ ऐसे जिएंगे
बनाएंगे बहाना जीवन से ना बड़ा होने के लिए
मचाएंगे सोर पापा के कंधे पर खड़ा होने के लिए
फिर हर एक पल को आनंद और मजे के साथ जिएंगे
मनाएंगे दिवाली इक हाथ से और सेवईयां साथ पियेंगे।
मिटाएंगे हसद और नफरत दिवाली के इसी दिये से
जो मिला मौका जीने का बचपना फिर से
तो फिर हम उसे कुछ ऐसे जिएंगे
ना रखेंगे किसी से बैर
और हर किसी के साथ खुशी का जाम पियेंगे
Poem 51
जो मिला मौका जीने का बचपना फिर से,
तो फिर हम उसे कुछ ऐसे जिएंगे —
ना रखेंगे किसी से बैर,
और हर किसी के साथ खुशी का जाम पियेंगे।
माना जिंदगी कट रही है अफरा-तफरी में, तो क्या?
मिला जो मौका जीने का बचपना इस दौर में,
तो हर किसी के साथ हँस कर जिएंगे।
दिए हैं जीवन में जितने ग़म अब तक जिंदगी ने,
एक-एक ग़म के हिसाब से
जीवन को सौ-सौ खुशियों के साथ जिएंगे।
जो मिला मौका जीने का बचपना फिर से,
तो फिर हम उसे कुछ ऐसे जिएंगे —
बनाएंगे बहाना जीवन से ना बड़ा होने के लिए,
मचाएंगे शोर पापा के कंधे पर खड़ा होने के लिए।
फिर हर एक पल को आनंद और मज़े के साथ जिएंगे,
मनाएंगे दिवाली एक हाथ से, और सेवईयाँ साथ पियेंगे।
मिटाएंगे हसद और नफ़रत दिवाली के इसी दीये से।
जो मिला मौका जीने का बचपना फिर से,
तो फिर हम उसे कुछ ऐसे जिएंगे —
ना रखेंगे किसी से बैर,
और हर किसी के साथ खुशी का जाम पियेंगे।
Poem 52
लगे जो व्यर्थ अनमोल सा ये जीवन तुम्हे
तो आज ही दवाखाना से घूम आना
ना हो मोहब्बत गर अपनी जिंदगी से तुम्हे
तो किसी रंक के कुटिया से घूम आना
लोग भटकते है दरबदर यहां थोड़े और पल जीने के लिए
गर ना हो यकीं तो कभी जिंदगी से दूर जाना
फिर ये जिंदगी कुछ अज़ीज़ से लग जाएगी तुम्हे
बस जाकर अपने बेटे का माथा चूम आना।
जो कद्र हीं नहीं करते हो जो तुम अपने जीवन की
जाकर साम आज शमशान से घूम आना
लगे जो व्यर्थ अनमोल सा ये जीवन तुम्हे
तो आज ही दवाखाना से घूम आना
Poem 53
लगे जो व्यर्थ, अनमोल-सा ये जीवन तुम्हें,
तो आज ही दवाख़ाने से घूम आना।
ना हो मोहब्बत गर अपनी ज़िंदगी से तुम्हें,
तो किसी रंक की कुटिया से घूम आना।
लोग भटकते हैं दर-ब-दर यहाँ थोड़े और पल जीने के लिए,
गर ना हो यक़ीं, तो कभी ज़िंदगी से दूर जाना।
फिर ये ज़िंदगी कुछ अज़ीज़-सी लग जाएगी तुम्हें,
बस जाकर अपने बेटे का माथा चूम आना।
जो क़द्र ही नहीं करते हो तुम अपने जीवन की,
जाकर शाम आज श्मशान से घूम आना।
लगे जो व्यर्थ, अनमोल-सा ये जीवन तुम्हें,
तो आज ही दवाख़ाने से घूम आना।
Poem 54
एक युद्ध अब भ्रष्टाचार के विरुद्ध करूंगा मैं
हर एक को उसके हक के लिए जागरूक करूंगा मैं
Poem 55
उनके ही हक के लिए उनको जागरूक करूंगा मैं
Poem 56
मैं कवि तो नहीं हु फिर भी अपने लफ्जों को सजाऊंगा
अपने जीवन के हर एक पल संगीत के सुर में गाऊंगा
न हो शब्द सही तो क्या मै फिर भी इसको लिखता जाऊंगा
मैं कवि तो नहीं हु फिर भी अपने लफ्जों को सजाऊंगा
जीवन में हो ग़म हजार फिर भी एक खुशी को ही हजार बताऊंगा
फिर अपनो के साथ जीवन सुख के साथ बिताऊंगा
मैं कवि तो नहीं हु फिर भी अपने लफ्जों को सजाऊंगा
माना शब्दों का ज्ञान नहीं है फिर भी जीवन की आप बीती गाऊंगा
यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक की हर इक दशा सुनाऊंगा
छद भर के खुशियों को सदियों तक गाऊंगा
मैं कवि तो नहीं हु फिर भी अपने लफ्जों को सजाऊंगा
Poem 57
मैं कवि तो नहीं हु फिर भी अपने लफ्जों को सजाऊंगा
अपने जीवन के हर एक पल संगीत के सुर में गाऊंगा
न हो शब्द सही तो क्या मै फिर भी इसको लिखता जाऊंगा
मैं कवि तो नहीं हु फिर भी अपने लफ्जों को सजाऊंगा
जीवन में हो ग़म हजार फिर भी एक खुशी को ही हजार बताऊंगा
फिर अपनो के साथ जीवन सुख के साथ बिताऊंगा
मैं कवि तो नहीं हु फिर भी अपने लफ्जों को सजाऊंगा
माना शब्दों का ज्ञान नहीं है फिर भी जीवन की आप बीती गाऊंगा
यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक की हर इक दशा सुनाऊंगा
छद भर के खुशियों को सदियों तक गाऊंगा
मैं कवि तो नहीं हु फिर भी अपने लफ्जों को सजाऊंगा
तुम खुद लिख सकते हो अपनी व्यथा सबको यही बताऊंगा
हर एक को तो नहीं पर कुछ को जरूर जगाऊंगा
उनको उनके जीवन का सही अर्थ दिखाऊंगा
एक इंसान भी जग जाए तो खुद को व्यर्थ न पाऊंगा
हर एक को तो नहीं पर कुछ को जरूर जगाऊंगा
तुम खुद लिख सकते हो अपनी व्यथा सबको यही बताऊंगा
मैं अपनी टूटी भाषा को एक अलग ही राग में गाऊंगा
मैं कवि तो नहीं हु फिर भी अपने लफ्जों को सजाऊंगा
Poem 58
मैं कवि तो नहीं हूँ, फिर भी अपने शब्दों को सजाऊँगा।
अपने जीवन के हर एक पल को संगीत के सुर में गाऊँगा।
न हों शब्द सही तो क्या, मैं फिर भी इसको लिखता जाऊँगा।
मैं कवि तो नहीं हूँ, फिर भी अपने शब्दों को सजाऊँगा।
जीवन में हों ग़म हज़ार, फिर भी एक खुशी को ही हज़ार बताऊँगा।
फिर अपनों के साथ जीवन मैं सुख के साथ बिताऊँगा।
मैं कवि तो नहीं हूँ, फिर भी अपने शब्दों को सजाऊँगा।
माना, शब्दों का ज्ञान नहीं है, फिर भी जीवन की आपबीती को ही गाऊँगा।
यहाँ जन्म से लेकर मृत्यु तक की हर एक दशा सुनाऊँगा।
छड़ भर की खुशियों को मैं सदियों तक गाऊँगा।
मैं कवि तो नहीं हूँ, फिर भी अपने शब्दों को सजाऊँगा।
"तुम खुद लिख सकते हो अपनी व्यथा" — सबको यही बताऊँगा।
हर एक को तो नहीं, पर कुछ को ज़रूर जगाऊँगा।
उनको उनके जीवन का सही अर्थ दिखाऊँगा।
एक इंसान भी जग जाए, तो खुद को व्यर्थ न पाऊँगा।
हर एक को तो नहीं, पर कुछ को ज़रूर जगाऊँगा।
"तुम खुद लिख सकते हो अपनी व्यथा" — सबको यही बताऊँगा।
मैं अपनी टूटी फूटी भाषा को एक अलग ही राग में गाऊँगा।
मैं कवि तो नहीं हूँ, फिर भी अपने शब्दों को सजाऊँगा।
Poem 59
मैं आज भी अपने साथ एक भ्रम रखता हूं
वो अब भी है मेरे साथ यही वहम रखता हूं
उन्हें मुश्किल ना हो खुशी के साथ जीने में
इसलिए उनसे अब ताल्लुकात कम रखता हूं
माना मुश्किलों में संभाला है उन्होंने
अपना ना होकर भी निखारा है उन्होंने
मेरे साथ उनके ग़म के सैलाब भर आते है
इसलिए उनके जज्बात दिलो में कम रखता हूं।
जिसने दिए हुनर लिखने का मुझे जीवन में
ना हो पीड़ा उनके जीवन में वास्ता इसलिए उनसे कम रखता हूं
मैं आज भी अपने साथ एक भ्रम रखता हूं
वो अब भी है मेरे साथ यही वहम रखता हूं
Poem 60
मैं आज भी अपने साथ एक भ्रम रखता हूँ,
वो अब भी हैं मेरे साथ बस यही वहम रखता हूँ।
उन्हें मुश्किल न हो खुशी के साथ जीने में,
इसलिए उनसे अब ताल्लुकात कम रखता हूँ।
माना मुश्किलों में सम्भाला है उन्होंने,
अपना न होकर भी निखारा है उन्होंने।
मेरे साथ उनके ग़म के सैलाब भर आते हैं,
इसलिए उनके जज़्बात दिलों में कम रखता हूँ।
जिसने दिया हुनर लिखने को मुझे जमाने में,
ना हो पीड़ा उनको खुशी से जीवन बिताने में,
इसलिए वास्ता उनसे अब कम रखता हूँ।
मैं आज भी अपने साथ एक भ्रम रखता हूँ,
वो अब भी हैं मेरे साथ बस यही वहम रखता हूँ।
Poem 61
मैं आज भी अपने साथ बस यही भ्रम रखता हूँ,
वो अब भी हैं मेरे साथ बस यही वहम रखता हूँ।
उन्हें मुश्किल न हो खुशियों के साथ जीने में,
इसलिए उनसे अब ताल्लुकात कम रखता हूँ।
माना मुश्किलों में सम्भाला है उन्होंने,
अपना न होकर भी मुझे निखारा है उन्होंने।
मेरे साथ उनके गमों के सैलाब भर आते हैं,
इसलिए उनके जज़्बात दिलों में कम रखता हूँ।
जिसने दिया हुनर लिखने को मुझे जमाने में,
ना हो पीड़ा उनको खुशी से जीवन बिताने में,
इसलिए मैं वास्ता उनसे अब कम रखता हूँ।
मैं आज भी अपने साथ बस यही भ्रम रखता हूँ,
वो अब भी हैं मेरे साथ बस यही वहम रखता हूँ।
Poem 62
मुझे वक्त ने सिखाए है ये दुनिया के हुनर
इस जहाँ में मेरा कोई कसूरवार नहीं
Poem 63
थोड़े बहाने जिंदगी से बनाए हैं हमने भी
सुख के खातिर दुख को गले है हमने भी
लोग जाते है कमाने परदेश में रहकर
जिदंगी घर से दूर रखकर गुजारे है हमने भी
बचपन में बचपन को खुशियों में बिताए है हमने भी
ढलते सूरज को देख कर मुस्कुराए है हमने भी
Poem 64
ऐ मस्जिदें अक्सा देखे तुझसे कैसे किनारा कर लिया
तेरे गुनाहगार के साथ कैसा मुताहिदा कर लिया
एक वक्त पर हम सब मिलकर तुझे बचाने आए थे
पर देख आज हम सब ने तुझसे कैसे किनारा कर लिया
ऐ मस्जिदें अक्सा देखे तुझसे कैसे किनारा कर लिया
देखे बेगुनाहों के लहू का कतरा तेरे आशियाने में
रखा था हम सबने दिल में पुख्ता इरादे तुझे आजाद कराने में
पर देख दुनिया के रंगीनियों को तुझसे किनारा कर लिया
ऐ मस्जिदें अक्सा देखे तुझसे कैसे किनारा कर लिया
देख कैसे अपने आख़िरत से कैसे किनारा कर लिया
अल्लाह और उनके रसूल से वादों से किनारा कर लिया
ऐ मस्जिदें अक्सा देखे तुझसे कैसे किनारा कर लिया
Poem 65
ऐ मस्जिदे अक्सा! देख, तुझसे कैसे किनारा कर लिया।
तेरे गुनाहगार के साथ कैसा मुताहिदा कर लिया!
एक वक़्त पर हम सब मिलकर तुझे बचाने आए थे,
पर देख, आज हम सब ने तुझसे कैसे किनारा कर लिया।
ऐ मस्जिदे अक्सा! देख, तुझसे कैसे किनारा कर लिया।
देख, बेगुनाहों के लहू का क़तरा तेरे आशियाने में,
रखा था हम सबने पुख्ता इरादे तुझे आज़ाद कराने को।
पर देख, दुनिया की रंगीनियों को चुना और तुझसे किनारा कर लिया।
ऐ मस्जिदे अक्सा! देख, तुझसे कैसे किनारा कर लिया।
देख, कैसे अपनी आख़िरत से भी किनारा कर लिया,
अल्लाह और उनके रसूल से किए वादों से किनारा कर लिया।
ऐ मस्जिदे अक्सा! देख, तुझसे कैसे किनारा कर लिया।
Poem 66
इसकी एक ललकार से पूरी सेना रणभूमि में घबराती थी।
कभी ये लक्ष्मी तो कभी फूले बनकर अन्याय को धूप चाटती थी
खुद पर सहती थी लाखों जख्म पर परिवार पर जब बन आती थी
तो ये पूरी दुनिया से अकेले लड़ने में भी ना कतराती थी
इसकी एक ललकार से पूरी सेना रणभूमि में घबराती थी।
इसकी महिमा की और गाथा से तुम्हे यही सबक सिखाती थी।
मान प्रतिष्ठा को देखकर ये दायरे में सिमट जाती थी
इसकी एक ललकार से पूरी सेना रणभूमि में घबराती थी।
Poem 67
इसकी एक ललकार से,
पूरी सेना रणभूमि में घबराती थी।
कभी ये रानी लक्ष्मी और फूले बनकर,
अन्याय को धूल चाटती थी।
खुद पर सहती थी लाखों ज़ख्म,
पर परिवार पर जब बन आती थी,
तो ये पूरी दुनिया से,
अकेले लोहा लेने से ना कतराती थी।
इसकी एक ललकार से,
पूरी सेना रणभूमि में घबराती थी।
इसकी महिमा और गाथा,
तुम्हें यही सबक सिखाती थी।
यहाँ वो साहस करके,
तुम्हें सबसे ताकतवर वर्ग दिलाती थी।
मान-प्रतिष्ठा में रहकर भी,
ये दुश्मन से रत्ती भर ना घबराती थी।
इसकी एक ललकार से,
पूरी सेना रणभूमि में घबराती थी।
Poem 68
एक व्यक्ति चले जाने से पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता
नश्वर जीवन एक पल के पीड़ा से पूरा जीवन निरर्थ नहीं होता
यहां सदियों तक साथ न जीने से एक पल का जीवन नहीं होता
एक व्यक्ति चले जाने से पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता
माना मन में पीड़ा हो तो खुशियों का आभाष नहीं होता
सब कुछ हो जीवन में, उसके ना होने से ये जीवन पूरा नहीं होता
चेहरे पर होती हर्ष की लाली पर मन में छड़ का भी हर्ष नहीं होता
एक व्यक्ति चले जाने से पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता
Poem 69
एक व्यक्ति चले जाने से पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता
एक पल की पीड़ा से पूरा जीवन निरर्थ नहीं होता।
यहाँ सदियों तक साथ न जीने से, एक पल का जीवन नहीं होता।
एक व्यक्ति चले जाने से, पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता।
माना, मन में पीड़ा हो तो खुशियों का आभास नहीं होता,
सब कुछ हो जीवन में, पर उसके ना होने से ये जीवन पूरा सा नहीं होता।
चेहरे पर होती है हर्ष की लाली, पर मन में क्षणभर का भी हर्ष नहीं होता।
एक व्यक्ति चले जाने से, पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता।
Poem 70
एक व्यक्ति के चले जाने से पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता
एक छड़ की पीड़ा होने से पूरा जीवन नि: अर्थ नहीं होता।
यहाँ सदियों तक साथ न होने से, एक पल का जीवन नहीं होता।
एक व्यक्ति के चले जाने से, पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता।
माना, मन में पीड़ा हो तो खुशियों का आभास नहीं होता,
सब कुछ हो अगर इस जीवन में, तो उसके ना होने से ये जीवन अधूरा नहीं होता।
एक व्यक्ति के चले जाने से, पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता।
चेहरे पर है हर्ष की लाली, पर मन में क्षण का भी हर्ष नहीं होता।
एक व्यक्ति ही जब पूरा जीवन हो, उसके न होने से इस जीवन का कोई अर्थ नहीं होता।
फिर इस जीवन को जीवन भर जीने का कोई अर्थ नहीं होता।
Poem 71
एक व्यक्ति के चले जाने से,
पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता।
एक क्षण की पीड़ा होने से,
पूरा जीवन निःअर्थ नहीं होता।
यहाँ सदियों तक साथ न होने से,
एक पल का जीवन नहीं होता।
एक व्यक्ति के चले जाने से,
पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता।
माना, मन में पीड़ा हो,
तो खुशियों का आभास नहीं होता।
सब कुछ हो अगर इस जीवन में,
उसका साथ न होने से जीवन अधूरा नहीं होता।
एक व्यक्ति के चले जाने से,
पूरा जीवन व्यर्थ नहीं होता।
चेहरे पर है हर्ष की लाली ,
पर मन में क्षण भर का भी हर्ष नहीं होता।
एक व्यक्ति ही जब पूरा जीवन हो,
उसके न होने से जीवन का अर्थ नहीं होता।
फिर इस जीवन को जीवन भर जीने भी,
इस जीवन का कोई अर्थ नहीं होता।
Poem 72
जिनसे मिलते हैं, एक एहसास छोड़ आते हैं,
ज़िंदगी में अपनी एक पहचान छोड़ आते हैं।
मेरे लहजे की जो ये नरमी है, ऐ आरिफ,
ज़िंदगी भर मुस्कुराने का अंदाज छोड़ आते हैं।
Poem 73
जो हम ढूंढते रहे कि गैरों में भी कोई अपना मिल जाए
रात में न सही दिन ही कोई हसीन सपना मिल जाए
यहां कहने को तो हजारों लोग है ईद मुबारक
कहे जो बे वजह हमसे सारी बातें बस वही अपना मिल जाए
बेशक ये दुनिया बहुत बड़ी है यहां जीने के लिए
जिंदगी छोटी है लोगो से गिला शिकवा करने के लिए
बस यहां वो यहां मिले वो हर ग़म को हरने के लिए
जो हम ढूंढते रहे कि गैरों में भी कोई अपना मिल जाए
रात में न सही दिन ही कोई हसीन सपना मिल जाए
Poem 74
जो हम ढूंढते रहे कि गैरों में भी कोई अपना मिल जाए,
रात में न सही, दिन ही कोई हसीन सपना मिल जाए।
यहां कहने को तो हजारों लोग हैं ‘ईद मुबारक’,
कहे जो बेवजह हमसे सारी बातें — बस वही अपना मिल जाए।
बेशक ये दुनिया बहुत बड़ी है यहां जीने के लिए,
जिंदगी छोटी है लोगों से गिला-शिकवा करने के लिए।
बस यहां वो मिल जाए, जो हर ग़म को हरने के लिए हो,
जो हम ढूंढते रहे कि गैरों में भी कोई अपना मिल जाए।
रात में न सही, दिन ही कोई हसीन सपना मिल जाए।
Poem 75
जिदंगी तो हजारों बहाने देती है रोने के,
मजा तो तब आता है जब गमों के बीच भी मुस्कुराया जाए।
Poem 76
जो तुम दोस्ती छोड़ खुशियां तलाश करते हो
तो क्या तुम खुद पर इतना इख्तियार रखते हो
क्या सच में तुम अपने मन में ये भ्रम पाले रखते हो
देखने तो दुनिया सच में बहुत हसीन दिखती है
दूर से तो सारी बातें खास अजीज दिखती है
मालूम है तुम्हे अगले ही पल ये दुनिया जालिम दिखती है
फिर भी तुम अपने मन में गैरो पर ऐतबार रखते हो
जो तुम दोस्ती छोड़ खुशियां तलाश करते हो
क्या तुम खुद पर इतना इख्तियार रखते हो
मिले जो मुझसे भी अजीज तुम्हे इस कायनात में
तो रख लेना उसे बना दोस्त अपने शख्सियात में
तेरे जाने पर भी तुझपे पूरा ऐतबार रखते है
अपना ना कहके भी तुझे खुद में संभाल रखते है
तुझे पूरी कायनात से दूर एक अलग कायनात में रखते है
हम खुद की खुशियां दोस्ती में तलाश करते है
हम तुझपे नहीं पर खुद की दोस्ती पर इख्तियार रखते है।
Poem 77
जो तुम दोस्ती छोड़, खुशियां तलाश करते हो,
तो क्या तुम खुद पर इतना इख़्तियार रखते हो?
क्या सच में तुम अपने मन में ये भ्रम पाले रखते हो?
देखने को तो दुनिया सच में बहुत हसीन दिखती है,
दूर से तो सारी बातें ख़ास अज़ीज़ दिखती हैं।
मालूम है तुम्हें — अगले ही पल ये दुनिया ज़ालिम दिखती है,
फिर भी तुम अपने मन में ग़ैरों पर ऐतबार रखते हो।
जो तुम दोस्ती छोड़, खुशियां तलाश करते हो,
क्या तुम खुद पर इतना इख़्तियार रखते हो?
मिले जो मुझसे भी अज़ीज़ तुम्हें इस कायनात में,
तो रख लेना उसे बना दोस्त — अपनी शख़्सियत में।
तेरे जाने पर भी तुझ पे पूरा ऐतबार रखते हैं,
अपना न कह के भी तुझे ख़ुद में संभाल रखते हैं।
तुझे पूरी कायनात से दूर — एक अलग कायनात में रखते हैं।
हम ख़ुद की खुशियां दोस्ती में तलाश करते हैं,
हम तुझ पे नहीं, पर अपनी दोस्ती पर इख़्तियार रखते हैं।
Poem 78
यहाँ कौन आया है, सदियों तक जीने?
सब कुछ यही छोड़ कर जाना है।
माना, छूट जाते हैं कुछ रिश्ते पल भर में —
हमको तो खुद में ही एक समुंदर बनाना है।
Poem 79
जिंदगी के कुछ उसूल मौत के साथ चलते है
हम चलते है ग़म के साए में पर सबसे हंस कर बात करते है
Poem 80
मेरे उस दोस्त ने किस कदर बेजान कर दिया
उसने मुझे मेरे ही कितना अनजान कर दिया
मुझे गुरूर था अपनी जिस दोस्ती पर
उसने उस दोस्तो को जलाकर
Poem 81
कुछ लम्हे बेशक हसीन तो होंगे,
हर लम्हे हम मौत के करीब होंगे।
छोड़ो सबको पलकों पर रखने की ख्वाइश,
दुनिया है तो यहाँ कुछ तो बदनसीब होंगे।
हर एक का मुकद्दर मेरे साथ नहीं होगा,
मेरी तक़दीर हर किसी की तरह ख़ास तो नहीं होगा।
जो छोड़ गए वो मुझे इस मझधार में,
वो मेरे नहीं तो किसी के वफ़ादार तो होंगे।
बेशक, कुछ लम्हे किसी के चमकदार तो होंगे।
Poem 82
मेरे उस दोस्त ने किस क़दर बेजान कर दिया,
उसने मुझे मुझसे ही कितना अनजान कर दिया।
मुझे इतना ग़ुरूर था अपनी जिस दोस्ती पर,
आज उसने ही उस दोस्ती से इनकार कर दिया।
मेरे उस दोस्त ने किस क़दर बेजान कर दिया,
सच में, दोस्ती की हदें मैंने कुछ यूं पार कर दिया।
सब छोड़ कर, उसके बातों पर ऐतबार कर दिया,
उसने ये — लिखने का एक अच्छा फ़नकार कर दिया।
उसने जो मोड़ा मुझे, पर एक अच्छा शिल्पकार भर दिया,
मेरे उस दोस्त ने, मुझे कुछ यूं अदाकार कर दिया।
Poem 83
ऐ जहाँ तेरी मुहब्बत की निशानी से क्या शिकवा करें,
तेरी इस ताज ने गरीबों की मुहब्बत का मजाक बना दिया।
Poem 84
लगे जो तुमने अपनी ये वीराना-सी जिंदगानी,
फिर शुरू करो तुम एक सफर से भरी कहानी।
जहाँ हो संगम का पानी — वो झाँसी की रानी की कहानी,
वो अजमेर की दीवानी, वो मुमताज की कहानी।
लगे जो तुमने अपनी ये वीराना-सी जिंदगानी,
फिर शुरू करो तुम एक सफर से भरी कहानी।
फिर जो शुरू होगी, वो रोचक भरी कहानी —
दिखेगी तुम्हें ये आसमान-सी चमकती ये जिंदगानी।
तुम भी लिखोगे एक अनकही, हकीकत से भरी कहानी।
लगे जो तुमने अपनी ये वीराना-सी जिंदगानी,
फिर शुरू करो तुम एक सफर से भरी कहानी।
Poem 85
मिली जो जीवन में सफलता तो मैं एक लफ्ज़ में सिमट जाऊंगा।
पर मिली जो असफलता उसके बाद भी मैं हजार रास्तों पर जाऊंगा।
हा माना सफलता से घर में खुशियों की भरमार लाऊंगा,
असफलता के उपरांत में घर में ग़मो का बौछार ही लाऊंगा।
पर सफलता से मैं एक चक्र में ही फंस कर रह जाऊंगा,
असफलता से मैं पूरे जीवन को एक बार फिर से देख पाऊंगा।
कुछ पल के लिए मौत को भी अपना हम साया बनाऊंगा।
इस जीवन को छोड़ मृत्यु की भी आशा मन में बढ़ाऊंगा।
पर जीवन की कठिनाइयों से मैं मृत्यु को गले नहीं लगाऊंगा।
एक बार जीवन में मै अवश्य असफलता को मात दिलाऊंगा।
फिर पाकर सफलता जीवन में मैं भी एक लफ्ज़ में सिमट जाऊंगा।
Poem 86
मिली जो जीवन में सफलता, तो मैं एक लफ़्ज़ में सिमट जाऊँगा।
पर मिली जो असफलता, उसके बाद भी मैं हज़ार रास्तों पर जाऊँगा।
हाँ, माना सफलता से घर में खुशियों की भरमार लाऊँगा,
असफलता के उपरांत मैं घर में ग़मों की बौछार ही लाऊँगा।
पर सफलता से मैं एक चक्र में ही फँस कर रह जाऊँगा,
असफलता से मैं पूरे जीवन को एक बार फिर से देख पाऊँगा।
कुछ पल के लिए मौत को भी कशमकश की लय में सजाऊंगा,
इस जीवन को छोड़, मृत्यु की भी आशा मन में एक क्षड़ बढ़ाऊँगा।
पर जीवन की कठिनाइयों से मैं मृत्यु को गले नहीं लगाऊँगा,
एक बार जीवन में मैं अवश्य असफलता को मात दिलाऊंगा।
फिर पाकर सफलता जीवन में, मैं भी एक लफ़्ज़ में सिमट जाऊँगा।
Poem 87
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(No content provided)
Poem 88
उसने कहा था मुझसे की हम ग़मो में डूब जाएंगे
जिंदगी की खुशी से एक पल में हम खुद ही रूठ जाएंगे
हम चाह कर भी उनसे कोई शिकवा नहीं कर पाएंगे
रख के मान उनकी दोस्ती का खुद में ही डूब जाएंगे
ना कह सकोगे हमें गलत और अपने आप से हो दूर जाएंगे
उसने कहा था मुझसे की हम ग़मो में डूब जाएंगे
उसके दूर जाने पर भी दोस्ती को हम कुछ ऐसे निभाएंगे
टूट जाएंगे हम फिर भी आखिरी सांस तक दोस्ती निभाएंगे
माना खुशियों से दूर रहेंगे पर उसकी यादों से मुस्कुराएंगे
उनको यादों को हम खुद में कुछ यूं रख जाएंगे
Poem 89
उसने कहा था मुझसे कि हम ग़मों में डूब जाएंगे,
ज़िंदगी की ख़ुशी से एक पल में हम खुद ही रूठ जाएंगे।
हम चाहकर भी उनसे कोई शिकवा नहीं कर पाएंगे,
रखकर मान उनकी दोस्ती का, खुद में ही डूब जाएंगे।
ना कह सकोगे हमें ग़लत, और अपने आप से दूर हो जाएंगे।
उसने कहा था मुझसे कि हम ग़मों में डूब जाएंगे।
उसके दूर जाने पर भी दोस्ती को हम कुछ ऐसे निभाएंगे,
टूट जाएंगे हम, फिर भी आख़िरी साँस तक दोस्ती निभाएंगे।
माना ख़ुशियों से दूर रहेंगे, पर उसकी यादों से मुस्कुराएंगे,
उनकी यादों को हम खुद में कुछ यूँ रख जाएंगे।
Poem 90
जो तुम सोचते हो किसी के बगिया से कोई फूल तोड़ लाओगे।
रख कर उसे अपने आशियाने में घर की रौनक तुम बढ़ाओगे।
Poem 91
जो तुम सोचते हो किसी के बगिया का फूल तोड़ लाओगे।
रख कर उसे अपने आशियाने में घर की रौनक बढ़ाओगे।
जो तुम उजाड़ कर एक बाप का घर खुद का महल सजाओगे।
Poem 92
जो तुम सोचते हो, किसी के बगिया का फूल तोड़ लाओगे।
रख कर उसे अपने आशियाने में, घर की रौनक बढ़ाओगे।
जो तुम उजाड़ कर एक बाप का घर, खुद का महल सजाओगे —
सोचो, जब एक फूल तुम्हारे आंगन में भी खिलखिलाएगा,
वो फूल भी तुम्हारे नज़रिए वालों की नज़र तो ज़रूर आएगा।
फिर करोगे क्या, जो तुम्हारे आंगन का कोई फूल तोड़ ले जाएगा,
तुम्हारे फूल से तुम्हारी ही तरह वो अपना आशियाँ सजाएगा।
सोचो, क्या तुम ऐसे हालात से खुद को उभार पाओगे?
जो तुम दूसरे का फूल तोड़ कर अपना घर बसाओगे,
जीते-जी तुम भी खुद मौत की ख़्वाहिश में लिपट जाओगे।
Poem 93
मैं वैकल्पिक नहीं हूं एक वास्तविक विकल्प हूँ
कुदरत द्वारा बनाया एक सुंदर काया कल्प हूँ
मैं भी अपने जीवन का एक सच्चाई का संकल्प हूँ
शायद आपके लिए हो मैं वैकल्पिक विकल्प हूँ
पर देख मैं भी एक वास्तव में वास्तविक विकल्प हूँ
मैं वैकल्पिक नहीं हूं एक वास्तविक विकल्प हूँ
हां मैं अपने आप में इकलौता अपना कल्प हूँ
हाँ हो सकता है मैं रंक हूँ पर औरों से नहीं अल्प हूँ
मैं लिख दूंगा कायनात की मैं इतना बड़ा संकल्प हूँ
मैं वैकल्पिक नहीं हूं एक वास्तविक विकल्प हूँ
Poem 94
मैं वैकल्पिक नहीं हूं, एक वास्तविक विकल्प हूँ।
कुदरत द्वारा बनाया, एक सुंदर काया-कल्प हूँ।
मैं भी अपने जीवन का, एक सच्चाई का संकल्प हूँ।
शायद आपके लिए हो, मैं वैकल्पिक विकल्प हूँ —
पर देख! मैं भी एक, वास्तव में वास्तविक विकल्प हूँ।
मैं वैकल्पिक नहीं हूं, एक वास्तविक विकल्प हूँ।
हाँ, मैं अपने आप में, इकलौता अपना कल्प हूँ।
हाँ, हो सकता है मैं रंक हूँ, पर औरों से नहीं अल्प हूँ।
मैं लिख दूंगा कायनात की, मैं इतना बड़ा संकल्प हूँ।
मैं वैकल्पिक नहीं हूं, एक वास्तविक विकल्प हूँ।
Poem 95
मैं वैकल्पिक नहीं हूं, एक वास्तविक विकल्प हूँ।
कुदरत द्वारा बनाया, एक सुंदर काया-कल्प हूँ।
मैं भी अपने जीवन का, एक सच्चाई का संकल्प हूँ।
शायद आपके लिए हो, मैं एक वैकल्पिक विकल्प हूँ —
पर देख! मैं भी एक, वास्तव में वास्तविक विकल्प हूँ।
इस दुनिया के लिए भले में अदना सा वैकल्पिक विकल्प हूँ।
हाँ, पर मैं अपने आप में, इकलौता अपना कल्प हूँ।
हाँ, हो सकता है मैं रंक हूँ, पर औरों से नहीं अल्प हूँ।
मैं लिख दूं कायनात को, मैं इतना बड़ा सच्चा संकल्प हूँ।
मैं वैकल्पिक नहीं हूं, एक वास्तविकता से भरा विकल्प हूँ।
नाम से भले मैं एक अदना और छोटा सा ही विकल्प हूँ
कर लें मुझे अपने मसरफ़ के लिए याद फिर भी मैं खुश हूँ
पर जान लो मैं वैकल्पिक नहीं हूं, खुद में प्राथमिक विकल्प हूँ।
Poem 96
मैं वैकल्पिक नहीं हूं, एक वास्तविक विकल्प हूँ।
कुदरत द्वारा बनाया, एक सुंदर काया-कल्प हूँ।
मैं भी अपने जीवन का, एक सच्चाई का संकल्प हूँ।
शायद आपके लिए हो, मैं एक वैकल्पिक विकल्प हूँ —
पर देख! मैं भी एक, वास्तव में वास्तविक विकल्प हूँ।
इस दुनिया के लिए भले ही मैं अदना-सा वैकल्पिक विकल्प हूँ,
हाँ, पर मैं अपने आप में, इकलौता अपना कल्प हूँ।
हाँ, हो सकता है मैं रंक हूँ, पर औरों से नहीं अल्प हूँ।
मैं लिख दूं कायनात को — मैं इतना बड़ा, सच्चा संकल्प हूँ।
मैं वैकल्पिक नहीं हूं — एक वास्तविकता से भरा विकल्प हूँ।
नाम से भले मैं एक अदना और छोटा-सा ही विकल्प हूँ,
कर लें मुझे अपने मसरफ़ के लिए याद, फिर भी मैं खुश हूँ।
पर जान लो — मैं वैकल्पिक नहीं हूं, खुद में प्राथमिक विकल्प हूँ।
Poem 97
मैं वैकल्पिक नहीं हूं, एक वास्तविक विकल्प हूँ।
कुदरत द्वारा बनाया, एक सुंदर काया-कल्प हूँ।
मैं भी अपने जीवन का, एक सच्चाई का संकल्प हूँ।
शायद आपके लिए हो, मैं एक वैकल्पिक विकल्प हूँ —
पर देख! मैं भी एक, वास्तव में वास्तविक विकल्प हूँ।
इस दुनिया के लिए भले ही मैं अदना-सा वैकल्पिक विकल्प हूँ,
हाँ, पर मैं अपने आप में, इकलौता अपना कल्प हूँ।
हाँ, हो सकता है मैं रंक हूँ, पर औरों से नहीं अल्प हूँ।
मैं लिख दूं कायनात को — मैं इतना बड़ा, सच्चा संकल्प हूँ।
मैं वैकल्पिक नहीं हूं — एक वास्तविकता से भरा विकल्प हूँ।
नाम से भले मैं एक अदना और छोटा-सा ही विकल्प हूँ,
कर लें मुझे अपने मसरफ़ के लिए याद, फिर भी मैं खुश हूँ।
पर जान लो — मैं वैकल्पिक नहीं हूं, खुद में प्राथमिक विकल्प हूँ।
Poem 98
वक्त बेमतलब ही नहीं गुजरता है;
लोगों की पहचान का आईना है ये वक्त।
Poem 99
मैं वैकल्पिक नहीं हूं, खुद में प्राथमिक विकल्प हूँ।
कुदरत द्वारा बनाया, एक सुंदर सी काया-कल्प हूँ।
मैं भी अपने जीवन का, एक सच्चाई से भरा संकल्प हूँ।
शायद आपके लिए हो, मैं एक वैकल्पिक विकल्प हूँ —
इस दुनियाँ के नजरों में मैं भले ही एक आवारा और अल्प हूँ।
सबके लिए भले ही एक अदना सा वैकल्पिक विकल्प हूँ
हाँ, पर मैं अपने आप में, इकलौता अपना कल्प हूँ।
हाँ, हो सकता है मैं रंक हूँ, पर औरों से ना अल्प हूँ।
मैं लिख दूं कायनात की हकीकत को — मैं इतना बड़ा संकल्प हूँ।
मैं वैकल्पिक नहीं हूं — एक वास्तविकता से भरा विकल्प हूँ।
कर लेना मुझे याद, गर मैं तेरे लिए अच्छा एक विकल्प हूँ।
मैं खुश हूँ वैकल्पिक ही सही पर मैं एक अच्छा सा विकल्प हूँ
पर जान लो — मैं वैकल्पिक नहीं हूं, खुद में प्राथमिक विकल्प हूँ।
Poem 100
मैं वैकल्पिक नहीं हूं, खुद में प्राथमिक विकल्प हूँ।
कुदरत द्वारा बनाया — एक सुंदर-सी काया-कल्प हूँ।
मैं भी अपने जीवन का — एक सच्चाई से भरा संकल्प हूँ।
शायद आपके लिए हो — मैं एक वैकल्पिक विकल्प हूँ,
इस दुनिया की नज़रों में — भले ही एक आवारा और अल्प हूँ।
सबके लिए भले ही — एक अदना-सा वैकल्पिक विकल्प हूँ,
हाँ! पर मैं अपने आप में — इकलौता अपना कल्प हूँ।
हाँ, हो सकता है — मैं रंक हूँ, पर औरों से ना अल्प हूँ।
मैं लिख दूं कायनात की हकीकत को — मैं इतना बड़ा संकल्प हूँ।
मैं वैकल्पिक नहीं हूं — एक वास्तविकता से भरा विकल्प हूँ।
कर लेना मुझे याद — गर मैं तेरे लिए अच्छा एक विकल्प हूँ।
मैं खुश हूँ, वैकल्पिक ही सही — पर एक अच्छा-सा विकल्प हूँ।
पर जान लो — मैं वैकल्पिक नहीं हूं, खुद में प्राथमिक विकल्प हूँ।
Poem 101
"जो देखा जमाने की मुश्किलों को, तो याद आया —
क्या गजब का था बचपना, जहाँ मुस्कुराने की कोई वजह नहीं होती थी।"
Poem 102
ग़म ये तमाम है मेरे हमें राय ना दीजिए।
Poem 103
ग़म ये तमाम है मेरे हमें राय ना दीजिए।
हम भी जमाने के सताए है असहाय ना कीजिए
देखे तो हमने भी दुनिया के हजारों रंगों को
इस जालिम से भरी दुनिया से उम्मीद ना किजिए
ग़म ये तमाम है मेरे हमें राय ना दीजिए।
इस जहाँ में सब अपने है ये गुमान न कीजिए
सब हकीकत के सपने है इन्हें सपने में जी लीजिए
हकीकत में उन्हें आप इन्हें अपना ना कीजिए
वक्त के साथी बस उन्हें उतनी ही अहमियत दीजिए
बेरुख होकर जाए फिर भी उन्हें तवज्जु ना दीजिए
उनको अपना समझना है तो खुशियों की उम्मीद ना कीजिए
ग़म ये तमाम है मेरे सभी हमें अपनी राय ना दीजिए।
Poem 104
ग़म ये तमाम हैं मेरे, हमें राय न दीजिए।
हम भी ज़माने के सताए हैं, झूठा सहारा न दीजिए।
देखे तो हमने भी हैं दुनिया के हज़ारों रंगों को,
इस ज़ालिम से भरी दुनिया से उम्मीद न कीजिए।
ग़म ये तमाम हैं मेरे, हमें राय न दीजिए।
इस जहाँ में सब अपने हैं — ये गुमान न कीजिए।
सब हक़ीक़त के सपने हैं, इन्हें सपनों में जी लीजिए;
हक़ीक़त में उन्हें आप अपना न कीजिए।
वक़्त के साथी हैं बस — उन्हें उतनी ही अहमियत दीजिए,
बेरुख़ होकर जाएं, फिर तो उन्हें तवज्जो न दीजिए।
गर उन्हें अपना समझना है, तो ख़ुशियों की उम्मीद न कीजिए।
ग़म ये तमाम हैं मेरे, सभी... हमें अपनी राय न दीजिए।
Poem 105
जो देखेंगे सपने हम अपना कल बनाने की
लगायेंगे आस जमाने से वफ़ा की राग गाने की
Poem 106
जो हम शिक्षा को समझ न पाएंगे
खुद को हम जमाने में ऊंचा न कर पाएंगे
देखने से लगती है बचपन की कठिनाइयां है
इसे न समझ पाए तो कुछ भी न समझ पाएंगे
फिर इस जमाने में एक नौकर हैसियत पाएंगे
न पाएंगे अपना अधिकार न उसको जान पाएंगे
जो हम शिक्षा को समझ न पाएंगे तो कदमों तले रौंदे जाएंगे
ये ऐसा श्रोत है सान से समाज में जीने का
इसी से मिलेगा ज्ञान विष का रस बना के पीने का
जो हम शिक्षा को समझ न पाएंगे
समाज कुरीतियों से हम न बच पाएंगे
जो हम शिक्षा का महत्व असल में जान जाएंगे
अंधेरे को हम अपने दर से चुटकियों में भगाएंगे
खुद का ठीक है साथ अपने देश का मान बढ़ाएंगे
अंतरिक्ष में भी अपने देश की शान उस तिरंगे को लहराएंगे
सारी कुरीतियों को तोड़ एक सुनहरा कल बनाएंगे
जो हम शिक्षा का महत्व असल में जान जाएंगे
खुशियों की बगियां हम पूरे भारत में लगायेंगे
Poem 107
जो हम शिक्षा को समझ न पाएंगे,
खुद को हम ज़माने में ऊँचा न कर पाएंगे।
देखने से लगती हैं बचपन की कठिनाइयाँ,
इसे न समझ पाए तो कुछ भी न समझ पाएंगे।
फिर इस ज़माने में एक नौकर हैसियत पाएंगे,
न पाएंगे अपना अधिकार, न उसको जान पाएंगे।
जो हम शिक्षा को समझ न पाएंगे,
तो कदमों तले रौंदे जाएंगे।
ये ऐसा स्रोत है शान से समाज में जीने का,
इसी से मिलेगा ज्ञान, विष का रस बनाकर पीने का।
जो हम शिक्षा को समझ न पाएंगे,
समाज की कुरीतियों से हम न बच पाएंगे।
जो हम शिक्षा का महत्व असल में जान जाएंगे,
अंधेरे को हम अपने द्वार से चुटकियों में भगाएंगे।
खुद का ही नहीं, साथ अपने देश का मान बढ़ाएंगे,
अंतरिक्ष में भी अपने देश की शान, उस तिरंगे को लहराएंगे।
सारी कुरीतियों को तोड़, एक सुनहरा कल बनाएंगे,
जो हम शिक्षा का महत्व असल में जान जाएंगे।
खुशियों की बग़ियाँ हम पूरे भारत में लगाएँगे।
Poem 108
सच कहूं तो सब अच्छा लगता है
बड़ा होकर भी मन अब बच्चा लग़ता है
परेशानियां से जो घबरा रहा है मन
Poem 109
यदि मैं सच कहूं तो सब अच्छा लगता था
बड़ा होकर भी मन जब बच्चा लग़ता था
परेशानियां से जो घबरा रहा हूं मैं इस जवानी में
मुसीबतें थी पर फिर भी बचपन स्वर्ग सा सच्चा लगता था
हा मैं इस जवानी के एक कोने में बच्चा लगता था
जहां मैं हर मुश्किलों को एक पिटारे में बंद रखता था
अपनो के साथ सपनो में भी मस्तियों मने हंसता रहता था
यदि मैं सच कहूं तो सब अच्छा लगता था
बड़ा होकर भी मन जब बच्चा लग़ता था
Poem 110
यदि मैं सच कहूं तो सब अच्छा लगता था
बड़ा होकर भी मन जब बच्चा लग़ता था
परेशानियां से जो घबरा रहा हूं मैं इस जवानी में
मुसीबतें थी पर फिर भी बचपन स्वर्ग सा सच्चा लगता था
हा मैं इस जवानी के एक कोने में जब मैं बच्चा लगता था
जहां मैं हर मुश्किलों को एक पिटारे में इकट्ठा रखता था
अपनो के साथ सपनो में भी मस्तियों में हंसता रहता था
यदि मैं सच कहूं तो सब अच्छा लगता था
बड़ा होकर भी मन जब बच्चा लग़ता था
Poem 111
यदि मैं सच कहूं, तो सब अच्छा लगता था।
बड़ा होकर भी मन, जब बच्चा लगता था।
परेशानियों से जो घबरा रहा हूं मैं इस जवानी में,
मुसीबतें थीं, पर फिर भी बचपन स्वर्ग-सा सच्चा लगता था।
हां, मैं इस जवानी के एक कोने में, जब मैं बच्चा लगता था,
जहां मैं हर मुश्किल को एक पिटारे में इकट्ठा रखता था।
अपनों के साथ, सपनों में भी मस्तियों में हंसता रहता था।
यदि मैं सच कहूं, तो सब अच्छा लगता था।
बड़ा होकर भी मन, जब बच्चा लगता था।
Poem 112
जो हम लिखें अपने दोस्त की वफ़ा
तो उसके लिए खास एहतराम लिख जायेंगे
दुनियां करती रहे उसकी लाख बुराईयां
हम उसकी अच्छाइयों से हिमालय बनायेंगे
जैसा भी हो वो अच्छा या बुरा मेरा यार है
उसकी लाख गलतियों पर भी दोस्ती निभाएंगे
रहकर उसके साथ उसकी हर एक गलती सही कराएंगे
उसके किरदार को जमाने में एक कोहिनूर सा चमकाएंगे
देख कर फिर जमाने के लोग हैरत में पड़ जायेंगे
छोटी सी दोस्ती को जो इतनी बुलंदियों पर पाएंगे
जो हम लिखें अपने दोस्त की वफ़ा
तो उसके लिए खास एहतराम लिख जायेंगे
Poem 113
जो हम लिखें अपने दोस्त की वफ़ा,
तो उसके लिए ख़ास एहतिराम लिख जाएंगे।
दुनिया करती रहे उसकी लाख बुराइयाँ,
हम उसकी अच्छाइयों से हिमालय बनायेंगे।
जैसा भी हो — वो अच्छा या बुरा — मेरा यार है,
उसकी लाख ग़लतियों पर भी दोस्ती निभाएंगे।
रहकर उसके साथ, उसकी हर एक ग़लती सही कराएंगे,
उसके किरदार को ज़माने में एक 'कोहिनूर'-सा चमकाएंगे।
देखकर फिर ज़माने के लोग हैरत में पड़ जाएंगे,
छोटी-सी दोस्ती को जो इतनी बुलंदियों पर पाएंगे।
जो हम लिखें अपने दोस्त की वफ़ा,
तो उसके लिए ख़ास एहतिराम लिख जाएंगे।
Poem 114
ऐ जिंदगी न कर शिकायत मेरे दोस्त की
उसने ही मुझे जिंदगी जीने का सलीका सिखाया
था तो मैं इस जमाने में एक अव्वल दर्जे का आवारा
इस अंधेरे से जीवन में मुझे रौशनी भरा दीपक दिखाया
जो जिंदगी दे रही है मुझे इतने ग़म आजमाने के लिए
Poem 115
ऐ जिंदगी न कर शिकायत मेरे दोस्त की
उसने ही मुझे जिंदगी जीने का सलीका सिखाया
था तो मैं इस जमाने में एक अव्वल दर्जे का आवारा
इस अंधेरे से जीवन में मुझे रौशनी भरा दीपक दिखाया
जो जिंदगी दे रही है मुझे इतने ग़म आजमाने के लिए
उसने ही मुझमें तुझसे लड़ने का है हौसला जगाया
ऐ जिंदगी न कर शिकायत मेरे दोस्त की
उसने ही मुझे जिंदगी जीने का सलीका सिखाया
मै था तो एक काटा ही अपने जीवन का
उसने मुझे बहते झरने जैसा शीतल बनाया
लेकर दूसरों का ग़म उन्हें भी हंसना सिखाया
ऐ जिंदगी न कर शिकायत मेरे दोस्त की
उसने ही मुझे जिंदगी जीने का सलीका सिखाया
मुझे खुद से वफादार है उसने ही बनाया
मुझमें लिखने का हुनर है उसने ही जगाया
जो मै कर रहा हूं अपने अल्फाजों को बयां
कोई और नहीं उसने ही मुझे इस काबिल है बनाया
ऐ जिंदगी न कर शिकायत मेरे दोस्त की
उसने ही मुझे जिंदगी जीने का सलीका सिखाया
Poem 116
ऐ ज़िंदगी, न कर शिकायत मेरे दोस्त की,
उसने ही मुझे ज़िंदगी जीने का सलीका सिखाया।
था तो मैं इस ज़माने में एक अव्वल दर्जे का आवारा,
इस अंधेरे से जीवन में मुझे रौशनी भरा दीपक दिखाया।
जो ज़िंदगी दे रही है मुझे इतने ग़म आज़माने के लिए,
उसने ही मुझमें तुझसे लड़ने का हौसला जगाया।
ऐ ज़िंदगी, न कर शिकायत मेरे दोस्त की,
उसने ही मुझे ज़िंदगी जीने का सलीका सिखाया।
मैं था तो एक काँटा ही अपने जीवन का,
उसने मुझे बहते झरने जैसा शीतल बनाया।
लेकर दूसरों का ग़म, उन्हें भी हँसना सिखाया।
ऐ ज़िंदगी, न कर शिकायत मेरे दोस्त की,
उसने ही मुझे ज़िंदगी जीने का सलीका सिखाया।
मुझे ख़ुद से वफ़ादार उसी ने ही बनाया,
मुझमें लिखने का हुनर उसी ने ही जगाया।
जो मैं कर रहा हूँ अपने अल्फ़ाज़ों को बयां,
कोई और नहीं, उसने ही मुझे इस काबिल बनाया।
ऐ ज़िंदगी, न कर शिकायत मेरे दोस्त की,
उसने ही मुझे ज़िंदगी जीने का सलीका सिखाया।
Poem 117
मैं हर लम्हे में बस तुझको ही याद करता हूँ
हां मैं खुद से भी बस तेरी बात करता हूँ
जमाना देता अगर इजाजत तुझे अपनाने की
तो मैं कहता कि मैं बस तुझसे ही प्यार करता हूँ
मैं हर लम्हे में बस तुझको ही याद करता हूँ
तेरी हर एक अदा पर खुद को वार करता हूँ
तेरी मुस्कुराहटों को एक टक निहारा करता हूँ
मैं खुद में भी तेरी ही झलक को निहारा करता हूँ
तेरी यादों को सोच मैं खुद में मुस्कुराया करता हूँ
हर अकेले लम्हे में बस तुझको ही पुकारा करता हूँ
हां मैं हर लम्हे में बस तुझको ही याद करता हूँ
Poem 118
मैं हर लम्हे में बस तुझको ही याद करता हूँ।
हाँ, मैं खुद से भी बस तेरी बात करता हूँ।
ज़माना देता अगर इजाज़त तुझे अपनाने की,
तो मैं कहता कि मैं बस तुझसे ही प्यार करता हूँ।
मैं हर लम्हे में बस तुझको ही याद करता हूँ।
तेरी हर एक अदा पर खुद को वार करता हूँ।
तेरी मुस्कुराहटों को एक टक निहारा करता हूँ,
मैं खुद में भी तेरी ही झलक को निहारा करता हूँ।
तेरी यादों को सोच, मैं खुद में मुस्कुराया करता हूँ।
तेरे बिना इजाज़त के, मैं तुझसे प्यार करता हूँ।
तेरी इज़्ज़त की खातिर, खुद को छुपाया करता हूँ,
पर हर लम्हे में बस तुझे ही सँवारा करता हूँ।
हाँ, मैं हर लम्हे में बस तुझको ही याद करता हूँ।
Poem 119
जो गर्म से तपते धूप में
Poem 120
सभ्यता और समाज, जब अपने अतीत को भूलने लगते हैं,
तो व्यक्तित्व का विनाश निश्चित हो जाता है।
✒️ Written by @mr_ariph_ansari
Poem 121
जो गर्म से धूप में तपता है वो बाप होता है
बच्चों के खुशी के लिए खुद रोता है वो बाप होता है
Poem 122
मैं हर लम्हे में बस तुझको ही याद करता हूँ।
हाँ, मैं खुद से भी बस तेरी बात करता हूँ।
ज़माना देता अगर इजाज़त तुझे अपनाने की,
तो मैं कहता कि मैं बस तुझसे ही प्यार करता हूँ।
मैं हर लम्हे में बस तुझको ही याद करता हूँ,
तेरी हर एक अदा पर खुद को वार करता हूँ।
जो बना मैं तेरी मुस्कुराहट की एक छोटी-सी वजह,
बस इसी लिए उस वजह को बार-बार दोहराया करता हूँ।
मैं हर लम्हे में बस तुझको ही याद करता हूँ।
तेरी यादों को सोच, मैं खुद में मुस्कुराया करता हूँ।
तेरे बिना इजाज़त के, मैं तुझसे प्यार करता हूँ।
तेरे वजूद को न कह दे कोई बेगैरत ज़माने में,
प्यार के दुश्मन लाखों हैं इस बेगैरत ज़माने में।
बस इसी लिए खुद को ज़माने से छुपाए फिरता हूँ।
फिर भी मैं हर लम्हे में बस तुझको ही याद करता हूँ।
✒️ Written by @mr_ariph_ansari
Poem 123
भले ही ज़िंदगी में ग़म समुद्र से भी गहरा क्यों न हो,
पर दोस्ती और गर्म चाय साथ हो तो ज़िंदगी जीने का मज़ा ही अलग होता है।
Poem 124
इस जमाने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे
पहले आप पहले आप में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे
यहां गलतियां तो बेशक हमसे भी हुई होगी
पर अपने इस तुच्छ सी घमंड में एक फरिश्ते को यूँ ही छोड़ जाएंगे।
जाएंगे उसे छोड़ कर बस अपने इस झूठे अहंकार के लिए
कल का भी हम सोच न पाएंगे अपना बस इस अहंकार के लिए
पर जब आयेगा होस वक्त के साथ तो कुछ भी हाथ न आएंगे
बस रोते रहेंगे अपने कल के लिए पर उसे भूल न पाएंगे
जो यहां फूल सी दोस्ती और रिश्तों को तोड़ेंगे हम
तो मिलेगा हमें भी मुकद्दर में एक अचेतना से भरा हम
इस जमाने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे
पहले आप पहले आप में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे
Poem 125
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
यहां ग़लतियां तो बेशक हमसे भी हुई होंगी,
पर अपनी तुच्छ सी घमंड में एक फ़रिश्ते को यूं ही छोड़ जाएंगे।
छोड़ आएंगे उसे, बस अपने इस झूठे अहंकार के लिए,
कल का भी हम सोच न पाएंगे, बस अपने इस घमंड के लिए।
पर जब आएगा होश वक़्त के साथ, तो कुछ भी हाथ न आएगा,
बस रोते रहेंगे अपने कल के लिए, पर उसे भूल न पाएंगे।
जब यहां फूल सी दोस्ती और रिश्तों को तोड़ेंगे हम,
तो मिलेगा हमें भी मुकद्दर में एक अचेतना-सा भरा हम।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
Poem 126
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
यहां ग़लतियां तो बेशक हमसे भी हुई होंगी,
पर अपनी तुच्छ सी घमंड में एक फ़रिश्ते को यूं ही छोड़ जाएंगे।
छोड़ आएंगे उसे, बस अपने इस झूठे अहंकार के लिए,
कल का भी हम सोच न पाएंगे, बस अपने इस घमंड के लिए।
पर जब आएगा होश वक़्त के साथ, तो कुछ भी हाथ न आएगा,
बस रोते रहेंगे अपने कल के लिए, पर उसे भूल न पाएंगे।
जब यहां फूल सी दोस्ती और रिश्तों को तोड़ेंगे हम,
तो मिलेगा हमें भी मुकद्दर में एक अचेतना-सा भरा हम।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
जिसको यहां एक पल के लिए खोने से डरते थे
आज उनसे एक लफ्ज़ भी न कह पाएंगे
उनको ही नहीं हम खुद को भी एक काटे से सजाएंगे
जिसे छूने पर हम अपने ही जीवन नुकसान पाएंगे
इस जमाने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे
पहले आप पहले आप में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे
पर अब हम खुद को पहले आप पहले करके में न फंसायेंगे
वो रूठ जाए हजारों दफा फिर भी हम उन्हें हजारों दफा मनाएंगे
इस जमाने में हम अपनों को ऐसे तो छोड़कर नहीं जाएंगे
होगी जो गुस्ताखियां हंसे तो उन्हें सिर झुकाकर मनाएंगे
जिंदगी एक बार की है तो हम दोस्ती बेहतरीन निभाएंगे।
Poem 127
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
यहां ग़लतियां तो बेशक बेशुमार होती होंगी हमसे भी,
पर तुच्छ सी घमंड में एक फ़रिश्ते को यूं ही छोड़ जाएंगे।
छोड़ आएंगे उसे — बस अपने इस झूठे अहंकार के लिए,
कल का भी हम सोच न पाएंगे — बस अपने इस अहंकार के लिए।
पर जब आएगा होश हमें इस वक़्त के साथ,
बस रोते रहेंगे अपने कल के लिए, पर उसे भूल न पाएंगे।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
जब यहां फूल सी दोस्ती और रिश्तों को तोड़ेंगे हम,
तो मिलेगा हमें भी मुकद्दर से बेशुमार सदियों भरा ग़म।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
जिसको यहां एक पल के लिए खोने से डरते थे,
आज उनसे एक लफ्ज़ कहने में लाखों दफा हिचकिचाएंगे।
उनको ही नहीं, हम खुद को भी एक कांटे पर सजाएंगे,
जिसके एहसास से हम अपने ही जीवन नुकसान पाएंगे।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
पर अब हम खुद को "पहले आप" करके में न फंसाएंगे,
वो रूठ जाए हज़ारों दफ़ा, फिर भी हम उन्हें हज़ारों दफ़ा मनाएंगे।
इस ज़माने में हम अपनों को ऐसे तो छोड़कर नहीं जाएंगे,
होगी जो गुस्ताखियां हमसे तो उन्हें सिर झुकाकर मनाएंगे।
ज़िंदगी एक बार की है, तो हम दोस्ती बेहतरीन निभाएंगे।
Poem 128
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
यहां ग़लतियां तो बेशक बेशुमार होती होंगी हमसे भी,
पर तुच्छ-सी घमंड में एक फ़रिश्ते को यूं ही छोड़ जाएंगे।
छोड़ आएंगे उसे — बस अपने इस झूठे अहंकार के लिए,
कल का भी हम सोच न पाएंगे — बस अपने इस अहंकार के लिए।
पर जब आएगा होश हमें इस वक़्त के साथ,
बस रोते रहेंगे अपने कल के लिए — पर उसे भूल न पाएंगे।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
जब यहां फूल-सी दोस्ती और रिश्तों को तोड़ेंगे हम,
तो मिलेगा हमें भी मुकद्दर से बेशुमार सदियों भरा ग़म।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
जिसको यहां एक पल के लिए खोने से डरते थे,
आज उनसे एक लफ़्ज़ कहने में लाखों दफ़ा हिचकिचाएंगे।
उन्हें ही नहीं, हम खुद को भी एक कांटे पर सजाएंगे,
जिसके एहसास से हम अपने ही जीवन को नुकसान पाएंगे।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
पर अब हम खुद को "पहले आप" की कश्मकश में नहीं फंसाएंगे,
वो रूठ जाए हज़ारों दफ़ा — फिर भी हम उन्हें हज़ारों दफ़ा मनाएंगे।
इस ज़माने में हम अपनों को ऐसे तो छोड़कर नहीं जाएंगे,
होगी जो गुस्ताखियां हमसे — तो उन्हें सिर झुकाकर मनाएंगे।
ज़िंदगी एक बार की है — तो हम दोस्ती बेहतरीन निभाएंगे।
Poem 129
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
यहां ग़लतियां तो बेशक बेशुमार होती होंगी हमसे भी,
पर तुच्छ-सी घमंड में एक फ़रिश्ते को यूं ही छोड़ जाएंगे।
छोड़ आएंगे उसे — बस अपने इस झूठे अहंकार के लिए,
कल का भी हम सोच न पाएंगे — बस अपने इस अहंकार के लिए।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
जब यहां फूल-सी दोस्ती और रिश्तों को तोड़ेंगे हम,
तो मिलेगा हमें भी मुकद्दर से बेशुमार सदियों भरा ग़म।
जिसको यहां एक पल के लिए खोने से डरते थे,
आज उनसे एक लफ़्ज़ कहने में लाखों दफ़ा हिचकिचाएंगे।
उन्हें ही नहीं, हम खुद को भी एक कांटे पर सजाएंगे,
जिसके एहसास से हम अपने ही जीवन को नुकसान पाएंगे।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
पर अब हम खुद को "पहले आप" की कश्मकश में नहीं फंसाएंगे,
वो रूठ जाए हज़ारों दफ़ा — फिर भी हम उन्हें हज़ारों दफ़ा मनाएंगे।
इस ज़माने में हम अपनों को ऐसे तो छोड़कर नहीं जाएंगे,
होगी जो गुस्ताखियां हमसे — तो उन्हें सिर झुकाकर मनाएंगे।
ज़िंदगी एक बार की है — तो हम दोस्ती बेहतरीन निभाएंगे।
Poem 130
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
यहां ग़लतियां तो बेशक बेशुमार होती होंगी हमसे भी,
पर तुच्छ-सी घमंड में एक फ़रिश्ते को यूं ही छोड़ जाएंगे।
छोड़ आएंगे उसे — बस अपने इस झूठे अहंकार के लिए,
कल का भी हम सोच न पाएंगे — बस अपने इस अहंकार के लिए।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
जब यहां फूल-सी दोस्ती और रिश्तों को तोड़ेंगे हम,
तो मिलेगा हमें भी मुकद्दर से बेशुमार सदियों भरा ग़म।
जिसको यहां एक पल के लिए खोने से डरते थे,
आज उनसे एक लफ़्ज़ कहने में लाखों दफ़ा हिचकिचाएंगे।
उन्हें ही नहीं, हम खुद को भी एक कांटे पर सजाएंगे,
जिसके एहसास से हम अपने ही जीवन को नुकसान पाएंगे।
इस ज़माने में हम अपनों को कुछ ऐसे छोड़ जाएंगे,
"पहले आप, पहले आप" में बने रिश्ते भी तोड़ जाएंगे।
Poem 131
ये वक्त ए आजमाईश भी कितना कमबख्त है
यहां अपने ही अपनों से बड़े सख्त है
जो मिलते थे गले हर ईद पर भुलाकर सारे शिकवे गिले
आज वही लोग लगते जमाने सूखे दरख़्त है
ये वक्त ए आजमाईश भी कितना कमबख्त है
इसने अपनों को ही अपनों को छुड़ाया है
देकर एक छोटी सी वजह सबकुछ एक झटके में मिटाया है
जो बोलते थे अपने यार के लिए शहद से भी मीठे बोले
आज उनके वो मीठे लफ्ज़ करेले भी ज्यादे शख्त है
ये वक्त ए आजमाईश भी कितना कमबख्त है
Poem 132
ये वक्त ही जिसने मुझे उनसे मिला दिया
वफादारी का जाम ही सही पर वक्त ने पिला दिया
यहां लोग सदियों तक खोजते है दौलत में ही दोस्ती
पर वक्त ने मुझे हीरे से दोस्त से वक्त पर मिला दिया
Poem 133
इस चमकती सी दुनिया में मैंने खुद को ऐसे खोया है
मिला कुछ भी नहीं पर मैने इसी में सब खोया है
लगता है कि दुनिया देती है मुस्कुराने के हजार वजह
जो देखा पीछे मुड़कर तो इसी दुनिया की वजह से रोया है
इस चमकती सी दुनिया में मैंने खुद को ऐसे खोया है
उम्मीदों के सहारे मुझे जीवन का पथ भी चढ़ना है
हर सुबह उठकर जीवन की कठिनाइयों से भी लड़ना है
देख कर दुनिया से ही जीवन का सबक भी पढ़ना है
बस इसी जिंदगी की कश्मकश में ऐसे रोया है।
खुद का चैन बेचकर खुद मुश्किलों को बोया है
इस चमकती सी दुनिया में मैंने खुद को ऐसे खोया है
मिला कुछ भी नहीं पर मैने इसी में सब खोया है
Poem 134
इस चमकती-सी दुनिया में मैंने खुद को ऐसे खोया है,
मिला कुछ भी नहीं, पर मैंने इसी में सब खोया है।
लगता है कि दुनिया देती है मुस्कुराने के हजार वजह,
जो देखा पीछे मुड़कर, तो इसी दुनिया की वजह से रोया है।
इस चमकती-सी दुनिया में मैंने खुद को ऐसे खोया है।
उम्मीदों के सहारे मुझे जीवन का पथ भी चढ़ना है,
हर सुबह उठकर जीवन की कठिनाइयों से भी लड़ना है।
देख कर दुनिया से ही जीवन का सबक भी पढ़ना है।
बस, इसी जिंदगी की कश्मकश में ऐसे रोया है,
खुद का चैन बेचकर, खुद मुश्किलों को बोया है।
इस चमकती-सी दुनिया में मैंने खुद को ऐसे खोया है,
मिला कुछ भी नहीं, पर मैंने इसी में सब खोया है।
Poem 135
चल उठ अभी जीवन में तुझे बहुत दूर तलक जाना है
दिए है जिसने काटे तुझे उन्हें भी हारों का फूल दिलाना है
खुद ही हार मानने से ये जमाना पीछा नहीं छोड़ती
इनको चुप कराने के लिए तुझे खुद को कामयाब बनाना है
चल उठ अभी जीवन में तुझे बहुत दूर तलक जाना है
अभी उस बाप को जमाने के हर सुख और आराम दिलाना है
जिसने काटे है जमाने में तेरे लिए कठिनाइयों से भरे पल
उस बाप के हैसियत को पूरे जमने को अभी दिखाना है
चल उठ अभी जीवन में तुझे बहुत दूर तलक जाना है
दिए है जिसने काटे तुझे उन्हें भी हारों का फूल दिलाना है
Poem 136
चल, उठ अभी जीवन में, तुझे बहुत दूर तलक जाना है।
दिए हैं जिसने काँटे तुझे, उन्हें भी हारों का फूल दिलाना है।
खुद ही हार मानने से ये ज़माना पीछा नहीं छोड़ती,
इनको चुप कराने के लिए, तुझे खुद को कामयाब बनाना है।
चल, उठ अभी जीवन में, तुझे बहुत दूर तलक जाना है।
अभी उस बाप को ज़माने के हर सुख और आराम दिलाना है।
जिसने काटे हैं ज़माने में, तेरे लिए कठिनाइयों से भरे पल,
उस बाप की हैसियत पूरे ज़माने को अभी दिखाना है।
चल, उठ अभी जीवन में, तुझे बहुत दूर तलक जाना है।
दिए हैं जिसने काँटे तुझे, उन्हें भी हारों का फूल दिलाना है।
Poem 137
सुना है, निरंतर प्रयास से व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आता है।
इसलिए, अपने थोड़ा-सा प्रयास के साथ चल रहा हूँ।
निखार न सही, मैं खुद के व्यक्तित्व को ही पहचान लूँ।
Poem 138
बस ऐसे ही चलते-चलते अंत तक चले जाएंगे,
नज़रें ढूंढती रहेंगी, फिर भी नज़र न आएंगे।
मुक्तसर भरी है ये छोटी-सी ज़िंदगी, यार,
मुस्कुराते हुए मौत के साथ बस यूँ ही चले जाएंगे।
Poem 139
पूरा ज़माना भी यहाँ एक वक्त के बाद फ़ानी है,
मैं ही नहीं, पूरा ज़माना ही बुलबुले का पानी है।
मुस्कुराकर महसूस कर ज़िंदगी के हसीन पल,
मुकर्रर वक्त के बाद, दुनिया को छोड़कर जानी है।
यहाँ रोना तो हर इंसान के मुक़द्दर की कहानी है।
Poem 140
मेरे किरदार को जमाना बस यूँ पहचानता है
जितना मैने उन्हें बताया उतना ही जानता है
लोगों के साथ रहकर गुजारता हूँ जो मैं ये वक्त
जमाना मुझको देखकर बस नासमझ ही जानता है
जो मैं वक्त के साए में दिखाऊं उनका ही आईना
हर शख्स को नापसंद होगा उनका ही आईना
हर सख्श मुझे अपने से अदना ही जनता है
मेरे किरदार को जमाना बस यूँ पहचानता है
जितना मैने उन्हें बताया उतना ही जानता है
वक्त के बहकावे में खुद को और से न आजमाइए
Poem 141
मेरे किरदार को जमाना बस यूँ पहचानता है
जितना मैने उन्हें बताया उतना ही जानता है
लोगों के साथ रहकर गुजारता हूँ जो मैं ये वक्त
जमाना मुझको देखकर बस नासमझ ही जानता है
जो मैं वक्त के साए में दिखाऊं उनका ही आईना
हर शख्स को नापसंद होगा उनका ही आईना
हर सख्श मुझे अपने से अदना ही जनता है
मेरे किरदार को जमाना बस यूँ पहचानता है
Poem 142
मेरे किरदार को ज़माना बस यूँ पहचानता है,
जितना मैंने उन्हें बताया, उतना ही जानता है।
लोगों के साथ रहकर गुज़ारता हूँ जो मैं ये वक्त,
ज़माना मुझको देखकर बस नासमझ ही जानता है।
जो मैं वक्त के साए में दिखाऊँ उनका ही अक्स,
हर शख़्स को नापसंद होगा उनका ही आईना।
हर शख़्स मुझे अपने से परे ही जानता है,
मेरे किरदार को ज़माना बस यूँ पहचानता है।
Poem 143
यहाँ हर मोड़ में पे रिश्ते बनते है
कुछ लोगों से बाते बनती है तो
कुछ लोगों से वाद बिगड़ते है
भारतीय रेल का कोच है साथी
यहाँ हर सीट पर वाद बिगड़ते है
ये मिनटों नहीं में घंटों देरी से चलते है
वक्त के नाम पर मूल मुद्रा ही वसूलते है
भारतीय रेल का कोच है प्यारे
यहाँ हर मोड़ में पे रिश्ते बनते है
Poem 144
यहाँ हर मोड़ पर रिश्ते बनते हैं,
कुछ लोगों से बातें बनती हैं तो,
कुछ लोगों से वाद बिखरते हैं।
भारतीय रेल का कोच है साथी,
यहाँ हर सीट पर अलग राग निकलते हैं।
मिनटों में नहीं, घंटों की देरी से चलते हैं,
वक़्त के नाम पर मूल मुद्रा ही वसूलते हैं।
जनता से लेकर पैसा, जनता को ही लूटा करते हैं,
ये भारतीय रेल का कोच है प्यारे,
हर सीट पर अलग-अलग वाद बिखरते हैं।
Poem 145
मेरे जज्बातों को नहीं अब अल्फाजों को देखा जाता है
मेरा मयार कितना भी हसीन हो पर गुमान देखा जाता है
लगता तो सबको यही है कि वो बहुत अजीज है
उनके अल्फ़ाज़ मुहासरे में सबसे बेहतर लजीज है
पर उनसे कभी भी मेरा मयार नहीं देखा जाता है
Poem 146
मेरे जज़्बातों को नहीं, अब अल्फ़ाज़ों को देखा जाता है,
मेरा मयार कितना भी हसीन हो, पर गुमान देखा जाता है।
लगता तो सबको यही है कि वो बहुत अज़ीज़ है,
उनके अल्फ़ाज़ मुहासरे में सबसे बेहतर, लज़ीज़ हैं।
पर उनसे कभी भी मेरा मयार नहीं देखा जाता है।
Poem 147
सुबह से लेकर सायं तक हम एक ही राग बस रटते है।
जीवन से लेकर मृत्यु तक बस इसी आस में खटते है।
होगा जो एक दिन नया सवेरा जिसमें
Poem 148
जैसी मां की ममता होगी वैसे बाप का छाया होगा।
एक नन्हे से बालक के अंदर वैसा ही हूबहू काया होगा।
Poem 149
ये दुनिया आज भी बाप का कर्ज बयां नहीं कर पाता है।
उसके
जहां ये दुनिया एक अदने से कर्ज के लिए
एक बड़ा सा जीवन बलिदान करती है
Poem 150
जो जाए कोई छोड़ कर तो उसकी अमानत याद रखना
उसके सारे राज अपने ही सीने में छिपा कर साथ रखना
जो होगी अमानत में ख़यानत तो बस इतना याद रखना
जो होगी उसकी रुसवाई तो साथ होगी तेरी भी परछाई
तू ये सोचकर बस इतना ही तू याद रखना
Poem 151
यहाँ जो सबको सब जो मिलते है
अच्छे वक्त को पाकर ही छलते है।
इस अनजानी अजनबियों की दुनिया में
अनजाने ही वो जान से ज्यादा खिलते है
जीवन की हर पीड़ा वो ही आकर हारते है
पाकर उस आनंद को ऊर्जा से हम अपना आकाश बनाते है
जो उड़ न सकता था एक डाली पर उस ऊर्जा से मिलो उड़ जाते है
यहाँ जो सबको सब जो मिलते है
Poem 152
वक़्त के साथ सफ़र करने की ख़्वाहिश थी जो मुझे,
ज़िंदगी ने वक़्त छीनकर, ज़िम्मेदारियों का बोझ दे दिया।
Poem 153
जो दिया हुनर लिखने का मुझे उसे बस इतना बताना है।
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीज खजाना बस इतना बताना है।
जो लिख नहीं सकता अपनी एक छोटी सी बातों को
फिरता था जो आवारा मैं अपने उलझन भरी रातों को
उसके लिए कुछ पंक्तियां लिखकर उसे ये जताना है
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीज खजाना बस इतना बताना है।
Poem 154
जो दिया हुनर लिखने का मुझे उसे बस इतना बताना है।
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीज खजाना है,
बस मिलकर उसे इतना जरूर बताना है
जो लिख नहीं सकता अपनी एक छोटी सी बातों को
फिरता था मैं जो आवारा अपने उलझन सी रातों को
उसके लिए कुछ लिखकर मुझे उसे ये जताना है
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीज खजाना है।
बस मिलकर उसे इतना जरूर बताना है
अब मैं खुद ही अपने शब्दों गलत ही सही पर को पिरोता हूँ
दुनियाँ के सामने तो नहीं पर इन्हीं शब्दों के सहारे रोता हूँ।
दिया है शब्दों को शब्दों को सजाने का हुनर उसे बताना है
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीज खजाना है,
बस उसे इतना जरूर बताना है
मिला वो मुझे शायद मेरे मुकद्दर से बस इतना उसे जताना है।
बस मिलकर उसे इतना जरूर बताना है
Poem 155
जो दिया हुनर लिखने का मुझे, उसे बस इतना बताना है।
दिया है उसने जीवन का सबसे अज़ीज़ ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
जो लिख नहीं सकता अपनी एक छोटी-सी बातों को,
फिरता था मैं जो आवारा, अपनी उलझन-सी रातों को।
उसके लिए कुछ लिखकर, मुझे उसे ये जताना है—
दिया है उसने जीवन का सबसे अज़ीज़ ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
अब मैं ख़ुद ही अपने शब्दों को, ग़लत ही सही, मगर पिरोता हूँ,
दुनिया के सामने तो नहीं, पर इन्हीं शब्दों के सहारे रोता हूँ।
दिया है शब्दों को सजाने का हुनर—उसे ये बताना है,
दिया है उसने जीवन का सबसे अज़ीज़ ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
मिला वो मुझे शायद मेरे मुक़द्दर से, बस इतना उसे जताना है।
दिया है उसने जीवन का सबसे अज़ीज़ ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
जो दिया हुनर लिखने का मुझे, उसे बस इतना बताना है।
दिया है उसने जीवन का सबसे अज़ीज़ ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
Poem 156
यूँ तो दिल-लगी इस रंगीन ज़माने से, बाद में दिल जलाती है;
ये तो चाय है, ऐ आरिफ, जो दिल जलाकर भी सुकून का एहसास दिलाती है।
Poem 157
वक़्त की मार ने मारा है ये तमाचा, ऐ आरिफ,
वरना कौन कबख़्त अपनी ख़ाक-ए-वतन को छोड़ना चाहता है।
Poem 158
मैं भी मुक़द्दर के कुछ हसीन ख़्वाब के साथ सोता हूँ,
पर सब सोचकर मुक़द्दर को अकेले चुपचाप रोता हूँ।
जहाँ सोता था मैं एक वक़्त माँ-बाप के साए में बेफ़िक्र होकर,
यहाँ माँ-बाप के बग़ैर, वीराने तन्हाई में हर रात रोता हूँ।
फिर भी मुक़द्दर के कुछ हसीन ख़्वाब के साथ सोता हूँ।
Poem 159
मेरा खुद में ही यूँ बिखर जाना शायद बहुत अच्छा है
खुद से मेरा झूठ न बोल पाना शायद बहुत अच्छा है।
यहाँ लोग कह के बीच सफर में ही छोड़ जाते है
दिल से दिल जोड़ कर के भी अपने ही मुंह मोड़ जाते है
फिर भी शायद उनपे ऐतबार कर जाना शायद बहुत अच्छा है
मेरा खुद में ही यूँ बिखर जाना शायद बहुत अच्छा है
जिंदगी की चक बकाहट में हम खुद को ही भूल जाते है
वक्त के बाद पाकर सबक फिर असलियत अपनाते है
फिर जिंदगी में नए अनुभवों का शायद बहुत अच्छा है
मेरा खुद में ही यूँ बिखर जाना शायद बहुत अच्छा है
खुद से मेरा झूठ न बोल पाना शायद बहुत अच्छा है।
Poem 160
मेरा खुद में ही यूँ बिखर जाना शायद बहुत अच्छा है।
खुद से मेरा झूठ न बोल पाना शायद बहुत अच्छा है।
यहाँ लोग कह के बीच सफर में ही छोड़ जाते हैं।
दिल से दिल जोड़ कर के भी अपने ही मुंह मोड़ जाते हैं।
फिर भी उन पर ऐतबार कर जाना शायद बहुत अच्छा है।
मेरा खुद में ही यूँ बिखर जाना शायद बहुत अच्छा है।
जिंदगी की बहाव में हम खुद को ही भूल जाते हैं।
वक्त के बाद पाकर सबक, फिर असलियत अपनाते हैं।
जिंदगी में नए अनुभवों का आना शायद बहुत अच्छा है।
मेरा खुद में ही यूँ बिखर जाना शायद बहुत अच्छा है।
खुद से मेरा झूठ न बोल पाना शायद बहुत अच्छा है।
Poem 161
जो देखता मैं इस जमाने को अपनी आवाज के लिए,
लोग ठोकर ही लगाते अपने मन के झूठे ताज के लिए।
इस लिए छोड़ दिया मैंने जमाने को उसके हाल पर तनहा।
खुद ही दौड़ लगा लिया अपने ही अंदर के ताज के लिए।
Poem 162
ये फूल सी दुनिया अब इस अजीब ए आई में ही अब बिखर जाएगी
इस नकली पहचान के लिए अपने ही हकीकत को मिटाएगी
कुदरत ने सवारा था हर एक के नक्श को बड़े ही फुर्सत से
नासमझ ये इन्सान पल भर के लिए अपने ही वजूद को ठुकराएगी
ये फूल सी दुनिया अब इस अजीब ए आई में ही अब बिखर जाएगी
इस नकली पहचान के लिए अपने ही हकीकत को मिटाएगी
कुदरत ने दिए थे बेशुमार खजाने और मौसम इस जमाने में
गंध दिए दिए छोटे फूलों में और कुदरती फल दिए हमें खाने में
ये फूल सी दुनिया अब इस अजीब ए आई में ही अब बिखर जाएगी
इस नकली पहचान के लिए अपने ही हकीकत को मिटाएगी
Poem 163
ये फूल सी दुनिया अब इस अजीब ए.आई. में ही अब बिखर जाएगी।
इस नकली पहचान के लिए अपने ही हकीकत को मिटाएगी।
कुदरत ने सवारा था हर एक के नक्श को बड़े ही फुर्सत से।
नासमझ ये इंसान पल भर के लिए अपने ही वजूद को ठुकराएगी।
ये फूल सी दुनिया अब इस अजीब ए.आई. में ही अब बिखर जाएगी।
इस नकली पहचान के लिए अपने ही हकीकत को मिटाएगी।
कुदरत ने दिए थे बेशुमार खजाने और मौसम इस जमाने में।
गंध दिए छोटे फूलों में और कुदरती फल दिए हमें खाने में।
ये फूल सी दुनिया अब इस अजीब ए.आई. में ही अब बिखर जाएगी।
इस नकली पहचान के लिए अपने ही हकीकत को मिटाएगी।
Poem 164
ये फूल सी दुनिया अब इस अजीब ए.आई. में ही बिखर जाएगी।
इस नकली पहचान के लिए अपने ही हकीकत को मिटाएगी।
कुदरत ने सवारा था हर एक के नक्श को बड़े ही फुर्सत से।
नासमझ ये इंसान पल भर के लिए अपने ही वजूद को ठुकराएगी।
ये फूल सी दुनिया अब इस अजीब ए.आई. में ही बिखर जाएगी।
इस नकली पहचान के लिए अपने ही हकीकत को मिटाएगी।
कुदरत ने दिए थे बेशुमार खजाने और मौसम इस जमाने में।
सुगंध दिए छोटे फूलों में और कुदरती फल दिए हमें खाने में।
पर सब भूल कर इंसानियत अब इस झूठे फरेब में ही गुजर जाएगी।
ये फूल सी दुनिया अब इस अजीब ए.आई. में ही बिखर जाएगी।
इस नकली पहचान के लिए अपने ही हकीकत को मिटाएगी।
Poem 165
जो दिया हुनर लिखने का, उसे बस इतना बताना है।
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीम सा ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
जो लिख नहीं सकता था अपनी एक छोटी-सी बातों को,
फिरता था जो मैं आवारा, अपनी ही उलझन-सी रातों को।
बस उसके लिए कुछ लिखकर, मुझे उसे ये जताना है—
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीम ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
अब मैं ख़ुद ही अपने शब्दों को, ग़लत ही सही, मगर पिरोता हूँ,
दुनिया के सामने तो नहीं, पर इन्हीं शब्दों के सहारे ही रोता हूँ।
दिया है शब्दों को सजाने का जो हुनर—उसे बस यही बताना है,
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीम ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
मिला था वो मुझे शायद मेरे मुक़द्दर से, इतना उसे बताना है।
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीम ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
उसने ही दिया है हुनर लिखने का मुझे, उसे बस एक बार बताना है।
Poem 166
जो दिया हुनर लिखने का, उसे बस इतना बताना है।
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीज ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
जो लिख नहीं सकता था अपनी एक छोटी-सी बातों को,
फिरता था जो मैं आवारा, अपनी ही उलझन-सी रातों को।
बस उसके लिए कुछ लिखकर, मुझे उसे ये जताना है—
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीज ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
अब मैं ख़ुद ही अपने शब्दों को—ग़लत ही सही—मगर पिरोता हूँ।
दुनिया के सामने तो नहीं, पर इन्हीं शब्दों के सहारे ही रोता हूँ।
दिया है शब्दों को सजाने का जो हुनर—उसे बस यही बताना है।
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीज ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
मिला था वो मुझे शायद मेरे मुक़द्दर से, इतना उसे बताना है।
दिया है उसने जीवन का सबसे अजीम ख़ज़ाना,
बस मिलकर उसे इतना ज़रूर बताना है।
उसने ही दिया है हुनर लिखने का मुझे—उसे बस एक बार बताना है।
Poem 167
जमाने की छोड़ ऐ आरिफ मैं खुद अपनी कमियों को मारता हूँ।
मैं टूटा अक्स ही सही पर खुद को शीश महल सा संवारता हूँ।
दुनिया वाले तो वहम है सिर्फ मेरी इस हसीन से लम्हे की।
अपनी जरूरतों पर तो मैं बस अपने रब को ही पुकारता हूँ।
Poem 168
जमाने की छोड़ ऐ आरिफ, मैं खुद अपनी कमियों को मारता हूँ।
मैं टूटा अक्स ही सही, पर खुद को शीशमहल-सा संवारता हूँ।
दुनिया वाले तो वहम हैं सिर्फ मेरी इस हसीन-से लम्हे की,
अपनी जरूरतों पर तो मैं बस अपने रब को ही पुकारता हूँ।
Poem 169
उसने मुझे जगाया हां शायद बहुत अच्छा हुआ
इस अंधेरे जीवन में रौशनी दिखाया शायद बहुत अच्छा हुआ
इस दौड़ते जमाने में मुझे दौड़ना सिखाया शायद बहुत अच्छा हुआ
Poem 170
मुकद्दर ने सिखाया था जो हंस कर टूटना मुझको
मनाना था सभी को पर न था रूठना मुझको
कयादत थी यही मेरी मुझे सब आम ही कहते थे
पागलों सा रंग रखता हूँ मुझे मेरे नाम से कहते थे
Poem 171
मुकद्दर ने सिखाया है जो हंस कर टूटना मुझको
मनाना है सभी को पर न है रूठना मुझको
हकीकत थी यही मेरी मुझे सब आम ही कहते है
पागलों सा रंग रखता था मुझे मेरे नाम से कहते है
अभी सीखना है वक्त से पर न है रूठना मुझको
मुकद्दर ने सिखाया है जो हंस कर टूटना मुझको
मनाना है सभी को पर न है रूठना मुझको
Poem 172
मुकद्दर ने सिखाया है जो हँस कर टूटना मुझको,
मनाना है सभी को, पर न है रूठना मुझको।
हकीकत थी यही मेरी — मुझे सब ‘आम’ ही कहते हैं,
पागलों-सा रंग रखता था, मुझे मेरे नाम से कहते हैं।
अभी सीखना है वक्त से, पर न है रूठना मुझको।
मुकद्दर ने सिखाया है जो हँस कर टूटना मुझको,
मनाना है सभी को, पर न है रूठना मुझको।
Poem 173
मिला था जीवन में जो खुशियों का खजाना उसे मै छोड़ आया हूँ
बचपन था इस जीवन में सबसे हसी बस उसे ही छोड़ आया हूँ
तोड़नी थी मुद्दतों से बंधी जंजीर गरीबी की बाप के कदमों से
कुछ नहीं बस इसी लिए खुद के गुरूर को कदमों के नीचे छोड़ आया हूँ
मिला था जीवन में जो खुशियों का खजाना उसे मै छोड़ आया हूँ
Poem 174
मिला था जीवन में जो खुशियों का खजाना उसे मै छोड़ आया हूँ
बचपन था इस जीवन में सबसे हसी बस उसे भी छोड़ आया हूँ
तोड़नी थी मुद्दतों से बंधी जंजीर गरीबी की बाप के कदमों से
बस इसी लिए खुद के गुरूर को कदमों तले छोड़ आया हूँ
मिला था जीवन में जो खुशियों का खजाना उसे मै छोड़ आया हूँ।
नसीहत दी जिसने भी उसे हूबहू मन मै याद रखता हूँ
वक्त ने मारा है पर फिर भी सारे जवाब पास रखता हूँ
सादगी है परवरिश में मेरे बाप के वजूद का साहिब।
बस इसी लिए उनको मुस्कुरा कर कुछ नहीं बस बोला आया हूँ।
मिला था जीवन में जो खुशियों का खजाना उसे मै छोड़ आया हूँ
बचपन था इस जीवन में सबसे हसी बस उसे भी छोड़ आया हूँ।
Poem 175
मिला था जीवन में जो खुशियों का खजाना, उसे मैं छोड़ आया हूँ।
बचपन है इस जीवन में सबसे हसीं, बस उसे भी छोड़ आया हूँ।
तोड़नी थी मुद्दतों से बंधी जंजीर गरीबी की पिता के कदमों से,
बस इसीलिए खुद के गुरूर को कदमों तले छोड़ आया हूँ।
मिला था जीवन में जो खुशियों का खजाना, उसे मैं छोड़ आया हूँ।
नसीहत दी जिसने भी, उसे हूबहू मन में याद रखता हूँ।
वक्त ने मारा है, पर फिर भी सारे जवाब पास रखता हूँ।
सादगी है परवरिश में मेरे पिता के वजूद की, आरिफ!
बस इसीलिए उनको मुस्कुरा कर कुछ नहीं — बस बोला आया हूँ।
मिला था जीवन में जो खुशियों का खजाना, उसे मैं छोड़ आया हूँ।
बचपन है इस जीवन में सबसे हसीं, बस उसे भी छोड़ आया हूँ।
Poem 176
गजब का नाज मुझे लाश ए फ़ानि में
था जो मुझे गुरूर अपने इस चढ़ते जवानी में
न था मुकाबल मेरे हुस्न का जमाने में
डूबे थे हम जो इस गुरूर से भरे खजाने में
आया जो वक्त हर एक मेरा कुछ यूँ टूट गया
था एक भ्रम ये वक्त का वो भी यूँ डूब गया
था मैं बस एक वक्त का बुलबुला पानी पर
गजब का नाज मुझे लाश ए फ़ानि में
था जो मुझे गुरूर अपने इस चढ़ते जवानी में
बचपन में सजाए थे लाखों सपने इस जमाने में
जिद्द था जो बचपन में जवानी को पाने में
पाया जो उसे तो बचपन सा वो हीरा छूट गया
हसीन लम्हों से हंसते खेलते मैं खुद रूठ गया
था मैं बस एक वक्त का बुलबुला पानी पर
गजब का नाज मुझे लाश ए फ़ानि में
था जो मुझे गुरूर अपने इस चढ़ते जवानी में
Poem 177
गज़ब का नाज़ था मुझे इस लाश-ए-फ़ानी में,
था जो मुझे ग़ुरूर अपने इस चढ़ती जवानी में।
न था मुक़ाबला मेरे हुस्न का ज़माने में,
डूबे थे हम जो इस ग़ुरूर से भरे ख़ज़ाने में।
आया जो वक़्त — हर एक मेरा कुछ यूँ टूट गया,
था एक भ्रम ये वक़्त का, वो भी यूँ डूब गया।
था मैं बस एक वक़्त का बुलबुला पानी पर —
गज़ब का नाज़ था मुझे इस लाश-ए-फ़ानी में।
था जो मुझे ग़ुरूर अपने इस चढ़ती जवानी में,
बचपन में सजाए थे लाखों सपने इस ज़माने में।
जिद थी जो बचपन में जवानी को पाने में,
पाया जो उसे — तो बचपन-सा वो हीरा छूट गया।
हसीन लम्हों से हँसते-खेलते मैं खुद रूठ गया,
था मैं बस एक वक़्त का बुलबुला पानी पर —
गज़ब का नाज़ था मुझे इस लाश-ए-फ़ानी में,
था जो मुझे ग़ुरूर अपने इस चढ़ती जवानी में।
Poem 178
उम्मीदों से चलती है ये दुनिया
फिर भी ये ना उम्मीद होती है
जब नहीं मिलता मनपसंद ख्वाब
फिर ये ख्वाब में बार बार रोती है
Poem 179
नसीहत दी जिसने भी मुझे चाय के बगैर,
ठुकरा दिए नसीहत को, समझ के उसको ग़ैर।
Poem 180
यूँ तो दौर में नशे से ख़फ़ा हम भी हैं,
इस दौर में चाय से वफ़ादार हम भी हैं।
कमबख़्त चाय ने दीवाना बना दिया,
वरना नशे के ख़िलाफ़ तो हम भी हैं।
Poem 181
वक्त के साथ संवारा है खुद को,
कैसे इन मुश्किलों से डर जाऊँ?
इतना भी कमजोर नहीं हूँ मैं,
जो इन छोटी लहरों से मर जाऊँ।
Poem 182
ना रख कल के वजूद की फ़िक्र, ऐ ग़ालिब,
आज तो मैंने देखा है, पर कल का पता नहीं।
Poem 183
मिला जो मौका कमाने का सब यार बचपना छोड़ आए है
दो कौड़ी कमाने के लिए हमने अपना ही आसिया तोड़ आए है
फिर बुलाए बचपन के यारो ने
तो सदियों बाद यार के शहर से हम मोड़ आए है
Poem 184
मिला जो मौका कमाने का, सब यार बचपना छोड़ आए हैं।
कौड़ी कमाने के लिए हम अपना ही आशियाँ तोड़ आए हैं।
फिर बुलाए है जो बचपन के यारों ने,
तो सदियों बाद यार के लिए शहर से हम मुड़ आए हैं।
Poem 185
मिला जो मौका कमाने का, सब यार बचपना छोड़ आए हैं।
कौड़ी कमाने के लिए हम अपना ही आशियाँ तोड़ आए हैं।
जो बुलाया बचपन के यारों ने हमें,
तो सदियों बाद यारों के लिए हम शहर से मुड़ आए हैं।
Poem 186
ये दुनिया ये महफिल और यहाँ जीने का सुरूर
पर सच कहे तो मसरूफ एक अलग ही कहानी है
सच कहे तो ये वक्त के बाद हकीकत में फ़ानी है
जैसे हम बस एक तालाब में बुलबुले का पानी है
कटती तो वैसे भी यहाँ सबकी जिंदगानी है
पर सच कहे तो मुझे लिखनी एक अलग ही कहानी है
Poem 187
ये दुनिया, ये महफ़िल और यहाँ जीने का सुरूर;
पर सच कहें तो ज़िंदगी एक अलग ही कहानी है।
यूँ कहें तो वक़्त के बाद, हक़ीक़त में फ़ानी है।
जैसे हम बस एक तालाब में, बुलबुले का पानी है।
कटती तो वैसे भी यहाँ सबकी ज़िंदगानी है,
पर मुझे तो लिखनी एक अलग ही अपनी कहानी है।
पर सच कहें तो ज़िंदगी एक अलग ही कहानी है,
जहाँ हर एक मोड़ पर नए रिश्ते और नए अंदाज़ आते हैं।
खा कर हक़ सभी का, हम फिर ख़ुदा की क़सम खाते हैं।
मालूम सबको है ये दुनिया, ये कायनात;
हर हाल में छोड़ जानी है।
पर सच कहें तो ज़िंदगी एक अलग ही कहानी है।
जहाँ माँ-बाप को जन्नत से कम न जाना है,
पर जवानी आते ही उनका कहना न माना है।
बाप बनकर फिर इन पीड़ाओं को जाना है,
पर सच कहें तो ज़िंदगी एक अलग ही कहानी है।
Poem 188
मैने गरीबी में खुद को खाया है
जलते आग पर खुद को जलाया है
जहां लोग सोते थे मखमल के बिस्तरों में
ठंड में हमने बर्फ को अपना बिस्तर बनाया है।
जब देखा खुद को टूटे आइने के अक्स में
मिला जिंदा मुर्दा जो था मेरे ही नक्श में
पर सपनो की उछाल ने मुझे राह दिखाया है।
मिलेंगी मंजिल मुझे मेरी हो आह ने बताया है।
फिर बर्फ की बिस्तर को मैं मोड जाऊंगा
वर्षों से बंधी जंजीर को मैं तोड़ जाऊंगा
जो मैने गरीबी में खुद को खाया है
जलते आग पर खुद को जलाया है
उस आग को भी मलमल में मोड आऊंगा
वर्षों से बंधी जंजीर को मैं तोड़ जाऊंगा
Poem 189
मैंने गरीबी में ख़ुद को खाया है,
जलती आग पर ख़ुद को जलाया है।
जहाँ लोग सोते थे मख़मल के बिस्तरों में,
ठंड में हमने बर्फ़ को अपना बिस्तर बनाया है।
जब देखा मैंने ख़ुद को टूटे से अक्स में,
मिला जो मुर्दा, था मेरे ख़ुद ही के नक़्श में।
मेरे सपनों की उछाल ने मुझे राह दिखाया है,
मिलेंगी मंज़िल मुझे, मेरी ही आह ने बताया है।
फिर बर्फ़ के बिस्तर को मैं मोड़ जाऊँगा,
वर्षों से बँधी ज़ंजीर को मैं तोड़ जाऊँगा।
जो मैंने गरीबी में ख़ुद को खाया है,
जलती आग पर ख़ुद को जलाया है,
उस आग को भी मलमल में मोड़ आऊँगा,
वर्षों से बँधी ज़ंजीर को मैं तोड़ जाऊँगा।
Poem 190
मैंने गरीबी में ख़ुद को खाया है,
जलती आग पर ख़ुद को जलाया है।
जहाँ लोग सोते थे मख़मल के बिस्तरों में,
ठंड में हमने बर्फ़ को अपना बिस्तर बनाया है।
वक्त की नोक पर जो अपनो ने सताया है
उम्मीद की किरण देकर चक्रव्यूह में फसाया है
वो हंसते थे जो मेरे हालत गफलत में
देखकर जो जलते थे यूँ ही नफरत में
यूँ ही नहीं अभी इतना शोहरत कमाया है
मैंने गरीबी में ख़ुद को खाया है,
और जलती आग पर ख़ुद को जलाया है।
वर्षों सो खोया अब जाकर वकार पाया है
जो बीते सालों से इस दिल में सजाया है
न मिलते थे जो दौर ए दौलत की गफलत में
छूते थे भी मेरी परछाइयों को भी आंखों की नफरत से
अब उनके भी आंखों का मोती खुद को बनाया है
ऐसे ही नहीं मैंने गरीबी में ख़ुद को खाया है,
और जलती आग पर ख़ुद को जलाया है।
Poem 191
मैंने गरीबी में ख़ुद को खाया है,
जलती आग पर ख़ुद को जलाया है।
जहाँ लोग सोते थे मख़मल के बिस्तरों में,
ठंड में मैंने बर्फ़ को अपना बिस्तर बनाया है।
वक़्त की नोक पर जो अपनों ने सताया है,
उम्मीद की किरण देकर चक्रव्यूह में फँसाया है।
वो हँसते थे, जो मेरे हालात-ए-ग़फ़लत पर,
देखकर जो जलते थे, यूँ ही नफ़रत में।
यूँ ही नहीं अभी इतनी शोहरत कमाई है,
मैंने गरीबी में ख़ुद को खाया है,
और जलती आग पर ख़ुद को जलाया है।
वर्षों से खोया, अब जाकर वक़ार पाया है,
जो बीते सालों से इस दिल में सजाया है।
न मिलते थे जो दौर-ए-दौलत की ग़फ़लत में,
छूते थे मेरी परछाइयों को, आँखों की नफ़रत से।
अब उनके भी आँखों का मोती ख़ुद को बनाया है,
ऐसे ही नहीं मैंने गरीबी में ख़ुद को खाया है,
और जलती आग पर ख़ुद को जलाया है।
Poem 192
मैं सो कर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ
मन की पीड़ा से जकड़ा हूँ फिर भी नहीं रोता हूँ
पूरे दिन सपनो की उड़ान जो उड़ता हूं
गिरने के बाद फिर एक बार गिरता हूँ
मैं बस कल का सूरज हूँ
आज डूब कर भी कल फिर निकला हूँ
मैं सो कर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ
सफर के बाद का मंजर हूँ
सारे हालात में सोने की चमक सा उभरता हूँ
जो भी हो मैं मुश्किलों के बाद ही निखरता हूँ
मैं सो कर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ
Poem 193
मैं सो कर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ।
मन की पीड़ा से जकड़ा हूँ, फिर भी नहीं रोता हूँ।
पूरे दिन सपनों की उड़ान जो उड़ता हूँ,
गिरने के बाद फिर एक बार गिरता हूँ।
मैं बस कल का सूरज हूँ,
आज डूब कर भी कल फिर निकला हूँ।
मैं सो कर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ।
सफ़र के बाद का मंजर हूँ,
सारे हालात में एक अलग सी चमक-सा उभरता हूँ।
जो भी हो, मैं मुश्किलों के बाद ही निखरता हूँ।
मैं सो कर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ।
एक से लेकर अनंत तक का सफर मैं पार करता हूँ
पल के सुकून के लिए पूरे जीवन का सुकून वार करता हूँ
बस इसी कश्मकश में आखिरी सांस को रोता हूँ
मौत को गले लगाकर बस अब आराम से सोता हूँ
मैं सो कर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ।
मन की पीड़ा से जकड़ा हूँ, फिर भी नहीं रोता हूँ।
Poem 194
मैं सोकर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ।
मन की पीड़ा से जकड़ा हूँ, फिर भी नहीं रोता हूँ।
पूरे दिन सपनों की उड़ान जो उड़ता हूँ,
गिरने के बाद फिर एक बार गिरता हूँ।
मैं बस कल का सूरज हूँ,
आज डूब कर भी कल फिर निकला हूँ।
मैं सोकर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ।
सफ़र के बाद का मंजर हूँ,
सारे हालात में एक अलग-सी चमक-सी उभरता हूँ।
जो भी हो, मैं मुश्किलों के बाद ही निखरता हूँ।
मैं सोकर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ।
एक से लेकर अनंत तक का सफ़र मैं पार करता हूँ,
पल के सुकून के लिए पूरे जीवन का सुकून वार करता हूँ।
बस इसी कशमकश में आख़िरी साँस को रोता हूँ,
मौत को गले लगाकर बस अब आराम से सोता हूँ।
मैं सोकर भी पूरी रात नहीं सोता हूँ।
मन की पीड़ा से जकड़ा हूँ, फिर भी नहीं रोता हूँ।
Poem 195
जिम्मेदारियों का बोझ, मैं खुद को छोड़ गया,
अपनी ही खुशियों से मैं खुद मुँह मोड़ गया।
घर की गरीबी की ज़ंजीर को तोड़ने के लिए,
अपने बरसों की ख़्वाहिशों को छोड़ गया।
Poem 196
क्या कहते हो
मुझे बस तुम छोड़ जाओगे
मेरे वजूद को निचोड़ जाओगे
गलतफहमी है तुम्हारी
Poem 197
बस अपने दिल में यही एक खयाल रखता हूँ
वो बिछड़े थे या बिछड़े है या बिछड़ेंगे
मन में यही कश्मकश भरे मलाल रखता हूँ
छोड़ जाते वो जमाने में हमें तो कोई ग़म न था
उनके इन अनसुलझे रवैए से
मैं खुद के हकीकत पर भी सवाल रखता हूँ
बस अपने दिल में यही एक खयाल रखता हूँ
Poem 198
बस अपने दिल में यही एक खयाल रखता हूँ—
वो बिछड़े थे, या बिछड़े हैं, या बिछड़ेंगे।
मन में यही कश्मकश भरा मलाल रखता हूँ।
छोड़ जाते वो तन्हा इस ज़माने में हमें, तो कोई ग़म न था;
पर उनके इन अनसुलझे रवैए से,
मैं खुद की हक़ीक़त पर ही सवाल रखता हूँ।
बस अपने दिल में यही एक खयाल रखता हूँ।
Poem 199
लफ़्ज़ों पर ख़ामोशी रख कर,
अब किताबों से बात करनी है।
जमाने को छोड़ कर ख़ुद पर,
अब इख़्तियार करनी है।
ये महफ़िल तो ज़ालिम है सदियों से,
तो छोड़ कर इस ज़ालिम महफ़िल को,
अपनी अलग ही महफ़िल की शुरुआत करनी है
Poem 200
ज़माने ने अपनाया बढ़ते दौर की चीज़ों को,
पर देख मेरी ग़ैरत—
मैंने आज तक उसके पहले सबक़ तक को नहीं भुलाया।
Poem 201
बढ़ती दुनिया दारी में तुम कुछ गुरूर बनाना
पर तुम उम्र को बेचकर भी पैसे जरूर कमाना
बढ़ती मायाजाल से बचकर ढेला डमरी ही बचाना
सुखी रोटी खाना पर आलीशान महल बनाना
पर तुम उम्र को बेचकर भी पैसे जरूर कमाना
ये माया मंत्र सुनाते है जब तुमसे कुछ नहीं पाते है
निराशा के बाद ये तुम्हारी एक नई परिभाषा सुनाते है
बस इसलिए इस दुनिया में तुम मन में सुरूर बनाना
पर तुम उम्र को बेचकर भी पैसे जरूर कमाना
Poem 202
बढ़ती दुनियादारी में तुम कुछ गुरूर बनाना,
पर तुम उम्र को बेचकर भी पैसे ज़रूर कमाना।
बढ़ते मायाजाल से बचकर ढेला-डमरी ही बचाना,
सूखी रोटी खाना, पर आलीशान महल बनाना;
पर तुम उम्र को बेचकर भी पैसे ज़रूर कमाना।
ये माया-मंत्र सुनाते हैं,
जब तुमसे कुछ नहीं पाते हैं।
निराशा के बाद ये तुम्हारी
एक नई परिभाषा सुनाते हैं।
बस इसलिए इस दुनिया में
तुम मन में सुरूर बनाना,
पर तुम उम्र को बेचकर भी
पैसे ज़रूर कमाना।
Poem 203
अब सदा बंदगी तो बस खुदा के नाम रखना है
जो भी हो पर रिश्ता सबसे बस आम रखना है।
निभाते है बस रिश्ते यहां वक्त ओ हालात को देखकर,
बस इसलिए अब खुद का रिश्ता खुद के नाम रखना है।
ना है खामियां उनके भी रवैए में ऐ आरिफ
क्योंकि उनको हमसे बस अपना काम रखना है।
बस इसलिए अब रिश्तों में बस नाम रखना है।
जो भी हो पर रिश्ता सबसे बस आम रखना है।
Poem 204
अब सदा बंदगी तो बस ख़ुदा के नाम रखना है,
जो भी हो, पर रिश्ता सबसे बस आम रखना है।
निभाते हैं बस रिश्ते यहाँ वक़्त और हालात को देखकर;
बस इसलिए अब ख़ुद का रिश्ता ख़ुद के नाम रखना है।
ना हैं ख़ामियाँ उनके भी रवैये में, ऐ आरिफ,
क्योंकि उनको हमसे बस अपना काम रखना है।
इसलिए जिंदगी में खुद को खुशमिजाज रखना है,
जो भी हो, पर रिश्ता सबसे बस आम रखना है।
Poem 205
दोस्त बनाकर जमाने को खुद के दोस्त को मारा मैने
दो पल की खुशी के लिए खुद को सदैव के लिए तीखारा मैने
माना मन जब भी बढ़ता है
तो अंदर भी यह लड़ता है
जब मैं मन से खुद हारा
मन भी बस यही पुकारा
जमाना ही बस तेरा सहारा
Poem 206
ना रखते तेरे होने का यूँ भरम
जो करते हम ये खुद पर करम
फिर हम भी खुद में न बेनाम होते
तेरे लिए फिर हम भी न आम होते
उसने कहा था न रख मेरे साथ यह अहम
मैं एक परिंदा हूँ उड़ जाऊंगी गगन के पार में
देख मेरी ग़ैरत छोड़ सका न तुझे मैं मझधार में
पर देख मैं खुद रह गया बस उसी गहरी अधियार में
जो होते हम खुद के लिए बस थोड़ा सा नरम
तो न पालते हम ये खुद में भरम
फिर हम भी खुद में न बेनाम होते
हमसे ही फिर जमाने के नाम होते।
Poem 207
ना रखते तेरे होने का यूँ भरम,
जो करते हम ये खुद पर करम।
फिर हम भी खुद में न बेनाम होते,
तेरे लिए फिर हम भी न आम होते।
उसने कहा था—न रख मेरे साथ यह अहम,
मैं एक परिंदा हूँ, उड़ जाऊँगी गगन के पार में।
देख मेरी ग़ैरत, छोड़ सका न तुझे मैं मझधार में,
पर देख, मैं खुद रह गया बस उसी गहरी अधियार में।
जो होते हम खुद के लिए बस थोड़ा-सा नरम,
तो न पालते हम ये खुद में भरम।
फिर हम भी खुद में न बेनाम होते,
हमसे ही फिर ज़माने के नाम होते।
Poem 208
माना तेरे सर ताज बढ़ते जा रहे है
मेरी हैसियत से ज्यादा तेरे वाकर बढ़ते जा रहे है
ये देख तो सही तेरी शोहरत के बावजूद मेरे हमराह बढ़ते जा रहे है
तू सच थी सच है और सच ही रहेगी मैने ये कब इनकार किया
पर देख तो सही तेरा सच ही तुझसे इनकार करते जा रहे है।
मेरी हैसियत से ज्यादा तेरे वाकर बढ़ते जा रहे है
दौलत मिलेगी तुझे और अभी इसमें कोई इख़्तेलाफ नहीं
इख़्तेलाफ तो ये है जो तू थी पर वो अब है नहीं।
बस वो पल वो यादें वो लम्हे सब याद ही आते है
दिल को छू कर मन के अंदर मायूसी का एहसास दिलाते है
खो दिया वो एक हीरा बस मन में है मलाल
मलाल है फिर याद आते है बस हाल है यही।
Poem 209
माना, तेरे ताज बढ़ते जा रहे हैं,
मेरी हैसियत से ज़्यादा तेरे वक़ार बढ़ता जा रहा हैं।
ये देख तो सही, तेरी शोहरत के बावजूद,
मेरे हमराह बढ़ते जा रहे हैं।
तू सच थी, सच है, और सच ही रहेगी—
मैंने ये कब इनकार किया?
पर देख तो सही,
तेरा सच ही तुझसे इनकार करता जा रहा है।
मेरी हैसियत से ज़्यादा तेरे वक़ार बढ़ता जा रहा हैं।
दौलत मिलेगी तुझे,
और अभी इसमें कोई इख़्तिलाफ़ नहीं;
इख़्तिलाफ़ तो ये है—
जो तू थी, पर वो अब है नहीं।
बस वो पल, वो यादें, वो लम्हे—
सब याद ही आते हैं;
दिल को छूकर,
मन के अंदर मायूसी का एहसास दिलाते हैं।
खो दिया वो एक हीरा,
बस मन में है मलाल;
मलाल है—
फिर वही यादें लौट आती हैं,
बस हाल है यही।
Poem 210
सुना है तू आज भी अपने अंदाज पर गुमान करती हो
लफ्जों से अपने पहले की तरह आज भी वार करती हो
हम थे जो कल को सोचकर आज को ठुकराया था
अपने ही हाथों अपने कल का गला दबाया था
उस बात पर तू आज भी इतना गुमान करती हो
अपने लफ्जों से पहले की तरह आज भी वार करती हो
माना बढ़ते जा रहे सिर के ताज आज भी
हमराह नया मिला है और मिला शहर का राज भी
तुम अपने हुस्न के दीदार का मोहताज करती आज भी हो
डालकर हुस्न का पर्दा छुपाती अपनी फरेब राज भी हो
Poem 211
शुरू के शुरुआत से
और लिखने के बात से
मैं खुद ही एक अलाप हूँ
मेरे अंदर का ही पाप हूँ
धूप के उस लाले से
और रात के उस काले से
मैं खुद में अंधकार हूँ
स्वयं में बेकार हूँ
फिर भी मैं एक पहाड़ हूँ
प्रारंभ का अंधकार हूँ
और प्रारंभ का बेकार हूँ
पर अंत का प्रकाश हूँ
जिंदगी का रास हूँ
पर न अंत में बेकार हूँ
मैं अंत का निखार हूँ
शुरू के शुरुआत से
और लिखने के बात से
हां मैं अलाप हूँ
खुद का ही तो श्राप हूँ
इसको तोड़ आऊंगा
पहाड़ में भी उगाऊंगा
मैं इतना छोटा न नाप
हां मैं खुद में अपने आप हूँ
Poem 212
शुरू की शुरुआत से,
और लिखने की उस बात से,
मैं खुद ही एक अलाप हूँ,
मेरे अंदर का ही पाप हूँ।
धूप के उस उजाले से,
और रात के उस काले से,
मैं खुद में ही अंधकार हूँ,
स्वयं में ही बेकार हूँ।
फिर भी मैं एक पहाड़ हूँ,
प्रारंभ का अंधकार हूँ,
और आरंभ का ही बेकार हूँ।
पर अंत का प्रकाश हूँ,
अंधकार का मैं नाश हूँ,
और ज़िंदगी का रास हूँ।
पर न आखिर का बेकार हूँ,
मैं अंत का ही निखार हूँ।
शुरू की शुरुआत से,
और लिखने की उस बात से,
हाँ, मैं अलाप हूँ,
खुद का ही तो श्राप हूँ।
इसको तोड़ आऊँगा,
पहाड़ों में फूलों को खिलाऊँगा।
बस मैं इतना छोटा श्राप हूँ,
हाँ, मैं खुद में अपने आप हूँ।
Poem 213
बस कहना यूँ है कि—
वो पल ही अच्छा था, जब दिल दोनों का बच्चा था।
रूठना, मानना, फिर मान कर रूठ जाना—सब कच्चा था।
ना मिलते थे हम भले एक आसमान के नीचे,
फिर भी हमने हज़ारों यादें एक पल में ही खींचे।
सोचो, वो पल हमारा यहाँ कितना अच्छा था,
जब हमारा दिल सच में एक नन्हा-सा बच्चा था।
यूँ तो छूटना था ये साथ, हमको भी पता था—साथ ये कच्चा था।
जीवन भर नहीं, बस दो पल के लिए ही ये पल अच्छा था।
वो पल ही अच्छा था, जब दिल दोनों का बच्चा था।
रूठना, मानना, फिर मान कर रूठ जाना—सब कच्चा था।
चलो फिर चलते हैं अब हम दोनों,
अपने-अपने अनोखे से सफ़र पर।
मिला वक़्त तो ठीक, नहीं तो फिर मिलेंगे
अपने उस छोटे से क़ब्र पर।
चलते-चलते बस इतना कहना था—
भले ही सब कच्चा था,
पल सच कहें तो, दोस्त, वही पल ज़िंदगी में अच्छा था।
शुक्रिया—
इस अनोखे से अंदाज़ में अलविदा कहने का हुनर देने के लिए।
शुक्रिया, कभी न पढ़ने वाले को किताबों से जोड़ने के लिए।
मैं तो था बंजर ज़मीं पर—
शुक्रिया, इस बंजर ज़मीं पर भी शब्दों को बोने के लिए।
अलविदा, ऐ दोस्त,
तेरा मेरी वीरान-सी ज़िंदगी में होने के लिए।
Poem 214
मायूसी भरे चेहरे पर भी ये मुस्कान लाया है
सबके दिलों में खुशियों का बौछार लाया है
जिनको मिलते न थे एक वक्त की रोटी भी
अपनी बरकत से उनके घर भी दस्तरखान लाया है
हाँ भाई अपने जिंदगी में बरकाती रमजान आया है
Poem 215
मायूसी भरे चेहरे पर भी ये मुस्कान लाया है,
सबके दिलों में खुशियों की बौछार लाया है।
जिनको मिलते न थे एक वक्त की रोटी भी,
अपनी बरकत से उनके घर भी दस्तरखान लाया है।
हाँ, भाई! अपनी जिंदगी में बरकाती रमजान आया है।
Poem 216
मायूसी भरे चेहरे पर भी ये मुस्कान लाया है,
सबके दिलों में खुशियों की बौछार लाया है।
जिनको मिलते न थे एक वक्त की रोटी भी,
अपनी बरकत से उनके घर भी दस्तरखान लाया है।
हाँ, भाई! अपनी जिंदगी में बरकती रमजान आया है।
Poem 217
फर्श पर बैठ कर सदियाँ यहाँ बिताना था,
सोच में था—अर्श पर फर्श हो, अपना ठिकाना था।
बस जिद थी फर्श से अर्श तक कूच करने की,
बस इसी लिए रातों को जागकर दिन का अंधेरा मिटाना था।
Poem 218
ना जाने किसने क्या-क्या देखा होगा,
गर्म रेत पर सोकर, भूखे पेट लौटा होगा।
है मेरे पास तो दुनिया की सहूलियत सारी,
पर उसकी सोच, जो एक वक़्त के लिए भी
अपनों के सामने ही रोता होगा।
Poem 219
उस शख़्स को यूँ अपने सपनों में बसाना था,
जैसे मरते लम्हों में भी दोस्ती सुकून का बहाना था।
वक़्त की फ़ितरत ने बिठाया है उसके बग़ैर आज मुझे,
वरना दोस्ती के बग़ैर तो सपनों में भी न एक वक़्त बिताना था।
Poem 220
लोगों के अल्फ़ाज़ों के तंज को अभी भूल जाना है,
ग़मों की हालत है, अभी से अभी पैरों की धूल खाना है।
ज़माना छोड़ता है रब पर, खुद की कमज़ोर हालात से,
नवाज़े अगर खुदा कुव्वत-ए-बदला, फिर मुझे फ़ैसला रब पर छोड़ जाना है।
Poem 221
सब्र के साथ जिंदा दिली को भी साथ रखना है।
जो छोड़ दे हाथ उसको भी साथ रखना है।
सीखना है मुझे अपनो से ही यहाँ सब कुछ मुझे
यहाँ वक्त से मुझे यह कुछ नहीं सीखना है।
सिखाता है वक्त तो सब छूट जाता है
जो होता है अपना उससे भी इंसान रूठ जाता है
सफलता का जाम मुझे अपनो के साथ चखना है
सब्र रख कर जिंदादिली को साथ रखना है।
Poem 222
सब्र के साथ जिंदा दिली को भी साथ रखना है।
जो छोड़ दे हाथ, उसको भी साथ रखना है।
सीखना है मुझे अपनों से ही यहाँ सब कुछ, मुझे
यहाँ वक्त से मुझे यह कुछ नहीं सीखना है।
सिखाता है वक्त, तो सब छूट जाता है,
जो होता है अपना, उससे भी इंसान रूठ जाता है।
सफलता का जाम मुझे अपनों के साथ चखना है,
सब्र रख कर जिंदादिली को साथ रखना है।
कैसे छोड़ दूं उन्हें जिसके कंधों पर सवार हूँ
उनके होने से ही तो मैं यहाँ बेशुमार हूँ
सब छोड़ कर बस अपनो पर गुमान रखना है
सब्र के साथ जिंदादिली दिल में बेशुमार रखना है।
Poem 223
सब्र के साथ जिंदादिली को भी साथ रखना है।
जो छोड़ दे हाथ, उसको भी साथ रखना है।
सीखना है मुझे अपनों से ही यहाँ सब कुछ,
मुझे यहाँ वक्त से कुछ नहीं सीखना है।
सिखाता है वक्त, तो सब छूट जाता है,
जो होता है अपना, उससे भी इंसान रूठ जाता है।
सफलता का जाम मुझे अपनों के साथ चखना है,
सब्र रखकर जिंदादिली को साथ रखना है।
कैसे छोड़ दूँ उन्हें, जिनके कंधों पर सवार हूँ,
उनके होने से ही तो मैं यहाँ बेशुमार हूँ।
सब छोड़कर बस अपनों पर गुमान रखना है,
सब्र के साथ जिंदादिली दिल में बेशुमार रखना है।
Poem 224
जो लिखा है मैने अब तक उसको भी छोड़ जाना है
मिला है जो हमें यहाँ उनसे भी हमे मुंह मोड़ जाना है
जो हम यहाँ गुरूर करते है इतना अपने आप पर
फरेब जमाना भी दिखाता है जो ये भरोसा आप पर
ये सब वहम बस आखिरी सांस से तोड़ जाना है
बनाए थे जो रिश्ते बड़े शिद्दत थे उन्हें भी यही छोड़ जाना है
बस लेकर एक सफेद सा कफन इस फ़ानी दुनिया से मुंह मोड़ जाना है
मिला है जो हमें अपना यहाँ उनसे भी हमे मुंह मोड़ जाना है
Poem 225
जो लिखा है मैंने अब तक, उसको भी छोड़ जाना है।
मिला है जो हमें यहाँ, उनसे भी हमें मुँह मोड़ जाना है।
जो हम यहाँ गुरूर करते हैं इतना अपने आप पर,
फ़रेब ज़माना भी दिखाता है, जो ये भरोसा आप पर।
ये सब वहम बस आख़िरी साँस से तोड़ जाना है।
बनाए थे जो रिश्ते बड़े शिद्दत से, उन्हें भी यहीं छोड़ जाना है।
बस लेकर एक सफेद सा कफ़न, इस फ़ानी दुनिया से मुँह मोड़ जाना है।
मिला है जो हमें अपना यहाँ, उनसे भी हमें मुँह मोड़ जाना है।
माना भ्रम है ये सारी दुनिया पर हमें सब यही बनाना है
चन्द सिक्के ही नहीं हमें पूरी दुनिया की दौलत कमाना है
है पता नहीं है झोली कफ़नो में पर फिर भी दौलत पाना है
अफसोस सद अफसोस पर अगले ही पल का कोई नहीं ठिकाना है
मिला है जो हमें यहाँ, उनसे भी हमें मुँह मोड़ जाना है।
Poem 226
जो लिखा है मैंने अब तक, उसको भी छोड़ जाना है।
मिला है जो हमें यहाँ, उनसे भी हमें मुँह मोड़ जाना है।
जो हम यहाँ गुरूर करते हैं इतना अपने आप पर,
फ़रेब ज़माना भी दिखाता है, जो ये भरोसा आप पर।
ये सब वहम बस आख़िरी साँस से तोड़ जाना है।
बनाए थे जो रिश्ते बड़े शिद्दत से, उन्हें भी यहीं छोड़ जाना है।
बस लेकर एक सफेद सा कफ़न, इस फ़ानी दुनिया से मुँह मोड़ जाना है।
मिला है जो हमें अपना यहाँ, उनसे भी हमें मुँह मोड़ जाना है।
माना भ्रम है ये सारी दुनिया, पर हमें सब यही बनाना है।
चंद सिक्के ही नहीं, हमें पूरी दुनिया की दौलत कमाना है।
है पता, नहीं है झोली कफ़नों में, पर फिर भी दौलत पाना है।
अफ़सोस, सद अफ़सोस, पर अगले ही पल का कोई नहीं ठिकाना है।
मिला है जो हमें यहाँ, उनसे भी हमें मुँह मोड़ जाना है।
Poem 227
बचपन में जो हमने जवानी के वो राज देखे थे
चन्द लम्हों में बेशुमार जवानी के ख्वाब देखे थे।
देखे थे बचपन में एक खुशियों भरी रात देखे थे
अपनो के साथ एक पल लाखों खुशियों के जज्बात देखे थे
जहां आज पहुंच नहीं सकते हमारे ये हाथ
वहां के भी बचपन में ख्वाब देखे थे
देखे थे बाप के कदमों में बैठा एक नवाब देखे थे
जो देखे थे ख्वाब अदना सा ख्वाब समझ के देखे थे
पर अब समझ आया बस ख्वाईशों के अंबार देखे थे
अब समझ आया बस ख्वाईशों के ख्वाब देखे थे
जो हो नहीं सकते पूरे वो सारे जज्बात देखे थे।
Poem 228
बचपन में जो हमने, जवानी के वो राज देखे थे,
चन्द लम्हों में बेशुमार, जवानी के ख्वाब देखे थे।
देखे थे बचपन में, एक खुशियों भरी रात देखे थे,
अपनों के साथ, एक पल में लाखों खुशियों के जज़्बात देखे थे।
जहाँ आज पहुँच नहीं सकते हमारे ये हाथ,
वहाँ के भी बचपन में ख्वाब देखे थे।
देखे थे बाप के कदमों में बैठा, एक नवाब देखे थे,
जो देखे थे ख्वाब, अदना सा ख्वाब समझ के देखे थे।
पर अब समझ आया, बस ख्वाहिशों के अंबार देखे थे,
अब समझ आया, बस ख्वाहिशों के ख्वाब देखे थे।
जो हो नहीं सकते पूरे, वो सारे जज़्बात देखे थे।
Poem 229
बचपन में जो हमने, जवानी के वो राज देखे थे,
चंद लम्हों में बेशुमार, जवानी के ख्वाब देखे थे।
देखे थे बचपन में, एक खुशियों भरी रात,
अपनों के साथ, एक पल की खुशियों में भी
लाखों खुशियों के जज़्बात देखे थे।
जहाँ आज पहुँच नहीं सकते हमारे ये हाथ,
वहाँ के भी बचपन में ख्वाब देखे थे।
देखे थे बाप के कदमों में बैठा, एक नवाब,
जो देखे बचपन में, अदना सा ख्वाब समझ के देखे थे।
पर अब समझ आया—बस ख्वाहिशों के अंबार देखे थे,
जो हो नहीं सकते पूरे, वो सारे जज़्बात देखे थे।
Poem 230
ज़िंदगी ने पुरज़ोर मेहनतें की हैं, मुझे रुलाने की;
पर अपनी भी ज़िद है, ग़मों के सैलाब में मुस्कुराने की।
Poem 231
मासूमियत बेचकर तजुर्बों को खरीदा है मैंने, आरिफ।
यूँ ही नहीं, आज मैं हुनर का बादशाह हूँ।
सोच रहा हूँ, बेचकर हुनर खरीद लूँ मासूमियत को,
पर सुना है—वक्त कभी किसी के शर्तों पर सौदे नहीं करता।
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